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19 February, 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) - द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी

स्वयंसेवक होने से बढ़कर गर्व और सम्मान की दूसरी बात हमारे लिए कोर्इ नहीं है। जब हम कहते हैं कि मैं एक साधारण स्वयंसेवक हूँ, तब इस दायित्व का बोध हमें अपने हदय में रखना चाहिए कि यह दायित्व बहुत बड़ा है। समाज की हमसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रहें और उन अपेक्षाओं को पूर्ण करते हुए हम उनसे भी अधिक अच्छे प्रमाणित हों। हर स्वयंसेवक ऐसे गुणवत्ता का बने इसके लिए संघ की सरल कार्यपद्धती है। संघ का समाज में प्रभाव अगर बढ़ा है और बढेगा तो केवल ऐसे स्वयंसेवकों के व्यवहार से ही बढेगा इसलिए स्वयंसेवक का संघ में स्थान अनन्यसाधारण है

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी (मराठी: माधव सदाशिव गोळवलकर ; जन्म: १९ फ़रवरी १९०६ - मृत्यु: ५ जून १९७३) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक तथा महान विचारक थे। उन्हें जनसाधारण प्राय: 'गुरूजी' के ही नाम से अधिक जानते हैं।

उनका जन्म फाल्गुन मास की एकादशी संवत् 1963 तदनुसार 19 फ़रवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य 'भाऊ जी' तथा माता का श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य 'ताई' था। उनका बचपन में नाम माधव रखा गया पर परिवार में वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। पिता सदाशिव राव प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में सन् 1908 में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में अध्यापक पद पर हो गयी। मधु जब मात्र दो वर्ष के थे तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी। पिताश्री भाऊजी जो भी उन्हें पढ़ाते थे उसे वे सहज ही इसे कंठस्थ कर लेते थे। बालक मधु में कुशाग्र बुध्दि, ज्ञान की लालसा, असामान्य स्मरण शक्ति जैसे गुणों का समुच्चय बचपन से ही विकसित हो रहा था। सन् 1919 में उन्होंने 'हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा' में विशेष योग्यता दिखाकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। सन् 1922 में 16 वर्ष की आयु में माधव ने मैट्रिक की परीक्षा चाँदा (अब चन्द्रपुर) के 'जुबली हाई स्कूल' से उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् सन् 1924 में उन्होंने नागपुर के ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित 'हिस्लाप कॉलेज' से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। अंग्रेजी विषय में उन्हें प्रथम पारितोषिक मिला। वे भरपूर हाकी तो खेलते ही थे कभी-कभी टेनिस भी खेल लिया करते थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम का भी उन्हें शौक था। मलखम्ब के करतब, पकड़ एवं कूद आदि में वे काफी निपुण थे। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने बाँसुरी एवं सितार वादन में भी अच्छी प्रवीणता हासिल कर ली थी। 

सबसे पहले ""डॉ॰ हेडगेवार"" के द्वारा काशी विश्वविद्यालय भेजे गए नागपुर के स्वयंसेवक भैयाजी दाणी के द्वारा श्री गुरूजी संघ के सम्पर्क में आये और उस शाखा के संघचालक भी बने। 1937 में वो नागपुर वापस आ गए। नागपुर में श्री गुरूजी के जीवन में एक दम नए मोड़ का आरम्भ हो गया। ""डॉ हेडगेवार"" के सानिध्य में उन्होंने एक अत्यंत प्रेरणा दायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। किसी आप्त व्यक्ति के द्वारा इस विषय पर पूछने पर उन्होंने कहा- "मेरा रुझान राष्ट्र संगठन कार्य की और प्रारम्भ से है। यह कार्य संघ में रहकर अधिक परिणामकारिता से मैं कर सकूँगा ऐसा मेरा विश्वास है। इसलिए मैंने संघ कार्य में ही स्वयं को समर्पित कर दिया। मुझे लगता है स्वामी विवेकानंद के तत्वज्ञान और कार्यपद्धति से मेरा यह आचरण सर्वथा सुसंगत है।" 1938 के पश्चात संघ कार्य को ही उन्होंने अपना जीवन कार्य मान लिया। डॉ हेडगेवार के साथ निरंतर रहते हुवे अपना सारा ध्यान संघ कार्य पर ही केंद्रित किया।इससे डॉ हेडगेवार जी का ध्येय पूर्ण हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक ""डॉ हेडगेवार"" के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव और प्रबल आत्म संयम होने की वजह से 1939 में माधव सदाशिव गोलवलकर को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। 1940 में ""हेडगेवार"" का ज्वर बढ़ता ही गया और अपना अंत समय जानकर उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं के सामने माधव को अपने पास बुलाया और कहा ""अब आप ही संघ का कार्य सम्भालें""। 21 जून 1940 को हेडगेवार अनंत में विलीन हो गए। 16 अगस्त 1946 को मुहम्मद अली जिन्नाह ने सीधी कार्यवाही का दिन घोषित कर के हिन्दू हत्या का तांडव मचा दिया। उन्ही दिनोँ में श्री गुरूजी देश भर के अपने प्रत्येक भाषण में देश विभाजन के खिलाफ डट कर खड़े होने के लिए जनता का आह्वान करते रहे किन्तु कांग्रेसी नेतागण अखण्ड भारत के लिए लड़ने की मनः स्थिति में नहीं थे। पण्डित नेहरू ने भी स्पष्ट शब्दों में विभाजन को स्वीकार कर लिया था और 3 जून 1947 को इसकी घोषणा कर दी गई। एकाएक देश की स्थिति बदल गई। इस कठिन समय में स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान वाले भाग से हिंदुओं को सुरक्षित भारत भेजना शुरू किया। संघ का आदेश था की जब तक आखिरी हिन्दू सुरक्षित ना आ जाए तब तक डटे रहना है। भीषण दिनों में स्वयंसेवकों का अतुलनीय पराक्रम, रणकुशलता, त्याग और बलिदान की गाथा भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखने लायक है। श्री गुरूजी भी इस कठिन घडी में पाकिस्तान के भाग में प्रवास करते रहे। b30 जनवरी 1948 को गांधी हत्या के मिथ्या आरोप में 4 फरवरी को संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। श्री गुरूजी को गिरफ्तार किया गया।देश भर में स्वयंसेवको की गिरफ्तारियां हुई। जेल में रहते हुवे उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं का विस्तृत व्यक्तव्य भेजा जिसमे सरकार को मुहतोड़ जवाब दिया गया था। आह्वान किया गया की संघ पर आरोप सिद्ध करो या प्रतिबन्ध हटाओ। देश भर में यह स्वर गूंज उठा था। 26 फरवरी 1948 को देश के प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल ने अपने पत्र में लिखा था ""गांधी हत्या के काण्ड में मैंने स्वयं अपना ध्यान लगाकर पूरी जानकारी प्राप्त की है। उस से जुड़े हुवे सभी अपराधी लोग पकड़ में आ गए हैं। उनमें एक भी व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नहीं है।"" 

9 दिसम्बर 1948 को सत्याग्रह नाम के इस आंदोलन की शुरुआत होते ही कुछ 4-5 हज़ार बच्चों का यह आंदोलन है ऐसा मानकर नेतागण ने इसका मजाक उड़ाया। लेकिन उसके उलट किसी भी कांग्रेसी आंदोलन में इतनी संख्या नहीं थी। 77090 स्वयंसेवकों ने विभिन्न जेलों को भर दिया। आख़िरकार संघ को लिखित संविधान बनाने का आदेश दे कर प्रतिबन्ध हटा लिया गया और अब गांधी हत्या का इसमें जिक्र तक नहीं हुआ। 

तब सरदार वल्लभभाई पटेल ने गुरूजी को भेजे हुवे अपने सन्देश में लिखा की ""संघ पर से पाबन्दी उठाने पर मुझे जितनी ख़ुशी हुई इसका प्रमाण तो उस समय जो लोग मेरे निकट थे वे ही बता सकते हैं... मैं आपको अपनी शुभकामनाएं भेजता हूँ।""

छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान योद्धा एवं रणनीतिकार होने के साथ -साथ धर्म व राष्ट्रीयता के जीवंत प्रतीक थे। शिवाजी महाराज ने अपने राज्य में सुशासन की कल्पना को साकार कर एक लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना की। उनका अदम्य साहस, उनकी बहादुरी व उनके संदेश हमको सदैव प्रेरित करते रहेंगे।

24 January, 2018

Padmaavat Movie Review : इतनी विवादों के बाद आखिरकार पद्मावत रिलीज हो ही गई

रानी पद्मिनी की बहादुरी और राजपूतों की शौर्य को बयां करती फिल्म पद्मावती जिसको हाल में पद्मावत कर दिया गया है । संजय लीला भंसाली द्वारा निर्मित इस फिल्म में दीपिका पादुकोण , रणवीर सिंह और शाहिद कपूर मुख़्य किरदार के रूप में है । मेवाड़ का गौरव और राजपूताना शौर्य की कथाएं इतनी कमजोर नहीं है कि किसी के तीन घंटे की फ़िल्म बना लेने से उनका इतिहास धूमिल हो जाए । फिर भी पद्मावत को लेकर हंगामा क्यों बरस रहा ? पूरे देश में करणी सेना इस फिल्म का विरोध कर रही है कई जगह आगजनी तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आ रही हैं  । राजपूत सुरक्षा के लिए होते थे वह सुरक्षा प्रदान करते थे लेकिन कुछ राजनीति लाभ के लिए यह सब करना ठीक नहीं । जितनी फिल्म विवादित रही उतना ही चर्चा में बनी रही और इस फिल्म की मार्केटिंग फ्री में ही पूरे देश में हो गई । संजय लीला भंसाली को बहुत बड़े-बड़े बैनर नहीं बनवाने पड़े । सबसे मजे की बात है यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी फिर भी राज्य सरकार अपने राज्य में इस फिल्म को दिखाने के लिए मना कर दी । सेंसर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट दोनों ने फिल्म को पास कर दिया जो विवादित सीन था उसे  हटा दिया गया उसके बाद भी इसको रिलीज न होने दिया जाए इसका क्या मतलब ठीक है । कोई भी फिल्म आने वाली पीढ़ी के लिए एक कहानी के रूप में एक इतिहास को बयां करती हुई नजर आती है यदि हम उसको ठीक तरीके से प्रस्तुत ना करें तो हम अपनी पीढ़ी को गलत चीज की जानकारी देते रहते हैं इसलिए सभी फिल्म निर्माता से निवेदन आग्रह है कि सही दिखाए क्या चीज सही है गलत है वह बहुत अच्छे ढंग से समझते भी है शायद इसीलिए पद्मावती या पद्मावत बहुत ज्यादा विवादित रही है । पता नहीं आप लोग की क्यो फिल्म का विरोध कर रहे है । मैं तो यह भी नहीं जानता कि आप लोगों ने फ़िल्म देखी भी है या नहीं । वैसे बता दे कि यदि किसी ने फिल्म देखी है वो यही कहता सुनाई दे रहा है कि फ़िल्म को देखने के बाद खिलजी के खिलाफ नफरत और बढ़ जाएगी यही नहीं राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती को इतने बेहतरीन तरीके में दर्शाया गया है की इन दोनों की वीरता की कहानी जैसी आपको इतिहास में दिखाइए पढ़ाई गई थी वैसा ही कुछ फिल्म में भी दर्शाया गया है । चाहे गोरा बादल हो चाहे राजा रतन सिंह रानी पद्मावती तक  किसी की भी सम्मान के साथ फिल्में में कोई समझौता नहीं किया गया है और हां आप का डर था की इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को हीरो की तरह दर्शाया गया है माफ कीजिएगा ऐसा कुछ नहीं है अलाउद्दीन खिलजी को एक बड़ा किरदार के रूप में जरूर दिखाए गया है बाकी अब तो फ़िल्म रिलीज हो ही चुकी है देखते है की करनी सेना और सुप्रीम कोर्ट में कौन सम्मानीय है ।
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एम के पाण्डेय निल्को

19 November, 2017

VMW Team - झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई ने अपने अद्भुत शौर्य और पराक्रम से न सिर्फ अंग्रेजों को नतमस्तक किया बल्कि पूरे विश्व मे भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित किया। रानी लक्ष्मीबाई ने भारतीय इतिहास में वीरता और स्वाभिमान का ऐसा अध्याय जोड़ा है जो सदियों तक देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा। 'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी' अदम्य साहस के साथ बोला गया यह वाक्य बचपन से लेकर अब तक हमारे साथ है . रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को बनारस के एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ. उन्हें मणिकर्णिका नाम दिया गया और घर में मनु कहकर बुलाया गया. 4 बरस की थीं, जब मां गुजर गईं. पिता मोरोपंत तांबे बिठूर जिले के पेशवा के यहां काम करते थे और पेशवा ने उन्हें अपनी बेटी की तरह पाला. प्यार से नाम दिया छबीली . मणिकर्णिका का ब्याह झांसी के महाराजा राजा गंगाधर राव नेवलकर से हुआ और देवी लक्ष्मी पर उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा. बेटे को जन्म दिया, लेकिन 4 माह का होते ही उसका निधन हो गया. राजा गंगाधर ने अपने चचेरे भाई का बच्चा गोद लिया और उसे दामोदार राव नाम दिया गया. ग्वालियर के फूल बाग इलाके में मौजूद उनकी समाधि आज भी मर्दानी की कहानी बयां कर रही है. हम सभी ने लक्ष्मीबाई की कहानी सुनी है, लेकिन सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कलम के जरिए उनकी जो बहादुरी हमारे सामने रखी, उसकी मिसाल दूसरी कोई नहीं.

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, 
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, 
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। 

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, 
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, 
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, 
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, 
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, 
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, 
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़। 

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, 
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, 
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, 
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, 
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, 
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई, 
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया, 
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, 
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, 
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया। 

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया, 
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, 
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया, 
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया। 

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, 
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात, 
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात? 
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात। 

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार, 
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार, 
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार, 
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'। 

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, 
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान, 
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, 
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान। 

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, 
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी, 
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, 
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी, 

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, 
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, 
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, 
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम। 

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में, 
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, 
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, 
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में। 

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, 
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार, 
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, 
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार। 

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, 
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी, 
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, 
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी। 

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार, 
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार, 
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार, 
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार। 

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, 
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, 
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, 
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, 

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, 
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, 
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, 
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। 

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

18 November, 2017

पद्मिनी ..और बॉलीवुड -By TRIPURENDRA OJHA

सभी पाठकों को नमस्कार !
मै त्रिपुरेन्द्र ओझा आपके लिए एक ब्लॉग लेकर आया हूँ , वैसे तो इसे आप इसे ब्लॉग न मान कर एक आवाज, एक चीख मानिये जो शब्दों के माध्यम से आप सब तक पहुँचाना चाहता हूँ |
वैसे भी जब कई मुद्दे बहुत ही परेशान कर देते हैं तो मैं बैठ जाता हूँ लिखने जो आज कल दौडभाग भरी जिन्दगी में दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है |
आइये मुद्दे पर आते है ,आज कल पद्मिनी पर बहुत शोर मचा हुआ है , पूरे देश भर में तमाम हिन्दू संगठन इस मुद्दे पर बवाल काट रहे हैं और तो और करनी सेना नाम के संगठन ने तो दीपिका पादुकोण कि नाक तक काटने कि धमकी दे डाली है |
वैसे भी ये पहला मामला नही है जब हिन्दू भावनाएं आहत करने का आरोप फिल्म उद्योग पर लग रहा है , इसके पहले भी कई बार बवाल कट चुकें है चाहे वो pk हो, जोधा अकबर, सेक्सी राधा, या फिर गोलियों कि रासलीला राम लीला ! बात ये है कि क्यों  आखिर ऐसा हो क्यों रहा ? उत्तर बड़ा ही कड़वा है और आसान है | इसका जिम्मेदार हिन्दू समाज खुद है जो अपने धर्म का खुद सम्मान नही करता | धर्म संस्कार और संस्कृति आज कल के पढ़े लिखे लोगों के लिए आडम्बर मात्र बन कर रह गया है , लोग खुद कृष्ण , हनुमान, द्रौपदी पर दूसरे समुदाय द्वारा बनाये गये जोक्स को पढ़कर हँसतें है और एक दूसरे को भेजतें हैं | ये जानने के बाद भी कि इस फिल्म में देवी देवताओं का मजाक बनाया जा रहा है लोग जम कर देखते हैं और फिल्म को ब्लॉकबस्टर करवा देते है जिससे फिल्म निर्माताओं का हौसला और बढ़ता है, उन्हें धर्म , संस्कृति और संस्कारों से कोई सरोकार नही होता उन्हें केवल अपनी दुकान चलानी होती है | ये हाई सोसाइटी के बेवकूफ,ड्रग्स और शराब सिगरेट के नशे में उल्टियाँ करने वाले हॉलीवुड की  नग्नता , मारपीट , एक्शन और गाली गलौच को चुरा कर हमारे युवा पीढ़ी को बर्बाद तो कर सकते हैं मगर इनकी इतनी औकात नही कि ये intersteller, lucy, gravity, shutter आइलैंड जैसी साइंस फिक्शन फ़िल्में बना कर युवाओ को विज्ञान जानने पर मजबूर करें अपितु ये केवल आइटम songs , सनी लीओन को ही बेच कर अपनी जेब भर सकते हैं |

कहते हैं कि अगर कोई बड़ा वृक्ष को सुखाना हो तो उसके जड़ में रोज विषैली चीजे डालते जाओ वो एक न एक दिन पूरी तरह से मर जायेगा ठीक वैसे ही हिन्दू संस्कृति को मारने के लिए षड़यंत्र किस कदर किये जा रहे हैं कि उसके पाठ्यक्रमों में उलटी सीधी चीजें वामपंथी प्रोफेसरों द्वारा डाल दी जातीं हैं जैसे BA पास  कोर्स में दिल्ली यूनिवर्सिटी में  AK रामानुजन का आर्टिकल 300 RAMAYANAS पढाया जा रहा था, जिसमें फ्रीडम of स्पीच के नाम पर उलटी सीधी चीजें, जैसे 300 प्रकार के रामायण हैं , सीता रावन के छींक से पैदा हुईं और लक्षमण और सीता में अनैतिक सम्बन्ध थे और भी उलटी सीधी चीजें आदि गलत और शर्मनाक तथ्यों को घुसेड कर हिन्दू धर्म को गलत दिशा में ले जाने और संस्कृति को जड़ से मिटाने के कुत्सित प्रयास हुए थे   जिसे काफी लड़ाइयाँ लड़ कर ३ साल बाद इस कोर्स को हटवाया गया | बॉलीवुड में pk जैसीं फ़िल्में बना कर ब्रेनवाश किया जाता है बच्चों का ताकि वो अपने धर्म से विमुख होकर अपनी संस्कृति कि धज्जियाँ उड़ा सकें और वर्षों पुरानी हमारी सभ्यता और संस्कृति का सफाया हो सके |

ये बात हिन्दू समाज के लोगों को खुद समझना होगा कि बॉलीवुड में गुलशन कुमार जैसे लोगों कि हत्या क्यों हो जाती है जिसके आरती के अल्बम आज भी सुबह सुबह हमारे घरों में बजते हैं , कुमार शानू , सोनू निगम , उदित नारायण, शान , सुखविन्दर जैसे लोगों को अचानक काम मिलना बंद क्यों हो जाता है , अरिजीत सिंह जैसे शानदार नव गायकों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की जाती है और चीख चीख कर गाने वालों को पकिस्तान से बुला कर सर आँखों पर बिठाया जाता है ,
जय माँ वैष्णो देवी , माँ संतोषी जैसी और तमाम धार्मिक फिल्मों कि लगातार सफलताओं के बाद क्यों गुलशन कुमार को मारकर नदीम जैसे लोग अरब भाग जाते हैं , उसके बाद खानों का दबदबा कैसे बढ़ जाता है कैसे पाकिस्तान से एक्टर और एक्ट्रेस और सिंगर्स को बुलाया जाता है, एक के बाद एक हिन्दू आपत्तिजनक फिल्मों और शब्दों  का प्रचलन बढ़ जाता है , सेक्सी राधा और सेक्सी दुर्गा, रासलीला जैसे शब्दों से हिन्दू भावनाओं पर कुठाराघात होता है  , अगर आप अब भी ये न समझे कि बॉलीवुड अंडरवर्ल्ड ,आतंकियों, और विदेशी ताकतों के इशारों पर चल रहा है तो आप बेवकूफ हैं  |

बात केवल पद्मिनी फिल्म की नही है बल्कि बात हिन्दू धर्म के ऊपर उठ रही उन षड्यंत्री कुठारों की है जिन्हें अगर हमने आज छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद का चोला ओढ़ कर नजरंदाज किया तो आने वाली पीढ़ी गर्त में डूब जाएगी , करवा चौथ , जलीकट्टू , दही हांड़ी , संक्रांति , होली , दीपावली आदि हर त्यौहारों के आते ही रंडी रोना मच जाता है | मै पूछता हूँ कि एनिमल क्रुएलिटी तुम्हे केवल जल्लीकट्टू पर ही क्यों दिखता है जब विशाल विशाल गाय और ऊँट जैसे जानवरों को धर्म के नाम पर काट देते हो तब क्यों नही दिखता ?     प्रदूषण केवल दीपावली पर ही क्यों दिखता है  २५ दिसम्बर से १ जनवरी तक क्यों नहीं दिखता? ऐसे ही फिल्मे मरियम और मोहम्मद साहब, कर्बला की लड़ाई पर क्यों नही बनती? बननी चाहिए लेकिन तुम्हे पता तुम्हारे फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का दंश केवल हिन्दू समाज ही बर्दाश्त कर सकता है बाकियों से तुम्हारी फटती है |

सबसे गंभीर बात ये है कि जब बात हिन्दू धर्म और संस्कृति की आती है तो  हमारा दलित समाज हमसे ही प्रश्न पूछने लगता है, हम कहते है उनसे प्रश्न नही पूछते कि क्यों अंबेडकर साहब ने इस्लाम ग्रहण नही किया आखिर क्यों ?
जैसे फूलन देवी पर मजा आया पद्मिनी पर रो क्यों रहे हो ? फूलन देवी पर फिल्म बनी तो खुद फूलन देवी ने बनवाई, उनकी सहमति बल्कि फिल्म की  रॉयल्टी भी उन्होने लिया , फिल्म के दृश्य पर भी न तो उन्होंने, न ही दलित समाज ने कोई आपत्ति की लेकिन तुम फूलन देवी को मोहरा बना कर हिन्दू समाज को मत बांटो, उस आवाज को मत कमजोर करो जो अब बुलंद हो रही है कि ये हिन्दुस्तान इस प्रकार के घटियापन को आपके नौटंकी द्वारा नहीं स्वीकार करेगा | जो अभिनेत्रियाँ नग्न होकर , देह प्रदर्शन करती घूमती है वो इसकी अधिकारी नहीं कि महा सती पद्मिनी का किरदार धारण भी कर सके , सच ही कहा किसी ने जो रोज बदलती शौहर वो जौहर क्या जाने ?याद करो कि राम और सीता किरदार निभाने  की वजह से अरुण गोविल और दीपिका घर घर में पूजे जाने लगे थे , क्योंकि उन्होंने उस किरदार के साथ न्याय किया और लेकिन आज वाली दीपिका और आज का निर्माता भंसाली  कहीं से भी पद्मिनी के किरदार के साथ न्याय नही करते,बल्कि उसे प्रेम प्रसंग और अश्लील मसाले के साथ परोसने का काम कर रहे हैं बिना ये सोचे कि जो चीज हिंदुस्तान का गौरव है , शान है उसको धूमिल करना उचित नहीं |

आखिर कब तक , कब तक सहेगा केवल एक समाज इस प्रकार के भावनाओं के साथ खिलवाड़ , क्या यही मंशा है तुम्हारी कि इतनी अति कर दो कि हिन्दू समाज का युवा भी आजिज होकर भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने वालों की गर्दन उड़ा दे , गोली मार दे और तुम ये कह सको कि आतंकवादी हिन्दू भी है , ताकि तोड़ सको ये मिथक कि शांति और अहिंसा का का जिम्मा केवल हिन्दुवों की है , कह सको कि तुम्हारी नीचता में हिन्दुवों ने भी बराबरी कर ली ? यही चाहते हो कि इस प्रकार के तुम्हारे फ्रीडम ऑफ़ स्पीच और फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के कारण हिन्दू समाज भी आतंक की भाषा बोलने लगे ? क्यों ले रहे धैर्य की परीक्षा ताकि ये तुम मजबूती से कह सको कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता ?
मत करो ये सब ! तुम्हारी स्वतंत्रता केवल वहीँ तक है जहाँ तक किसी की नाक नहीं आती ,रहने दो शांति से , मत करो हमारे उन इतिहासों के साथ छेड़छाड़ जिनकी वजह से आज हम खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं , मत करो प्रताड़ित अपने स्वतंत्रता के नाम पर उस समाज को जिसका आधार हिन्दुस्तान है , मत करो षड्यंत्र हमारे बच्चों के साथ जो पद्मावत को इस नाच के रूप में जानें , मत कुरेदो  हमारे जख्म फिर से पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर चंद पैसों के लिए, मत भटकाओ हमारी आने वाली पीढ़ी को , मत करो हमें हमारे धर्म के विमुख या फिर मत बनाओ हमें धर्म के प्रति इतना कट्टर  |
मत तैयार करो कोई और गोडसे ..............|



-                                                                                        त्रिपुरेन्द्र कुमार ओझा  ‘निशान’
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