26 December, 2010

भष्ट कैसे बना श्रेष्ठ

खर्च करके ही इन्‍सान कमाना सीखता है, और इसके लिऐ मेहनत जरूरी हैं जो देश और समाज दोनो के लिऐ आवश्‍यक हैं सरकार का काम बुनियादी आवश्‍यकताओ को सुचारू व सुनिश्चित करना हैं वोट बैंक के नाम पर सरकारी लंगर चलाना मक्‍कारी को जन्‍म देता हैं, आज जिस वेतन पर पिता कार्यमुक्‍त हो रहा हैं बेटा उसी वेतन पर नौकरी की शुरूवात कर रहा हैं
Yogesh
 आप चाहे जो कहें। पर भष्ट होना आज की तारीख में श्रेष्ठ होने से कमतर नहीं है। श्रेष्ठ होने का पैमाना होता है मगर भष्ट होने का कोई पैमाना नहीं होता है। आप कैसे भी। कहीं भी। किधर भी। भष्ट हो सकते हैं। कहीं कोई रोक-टोक नहीं। समाज में जितनी जल्दी पहचान भष्ट और भष्टाचार को मिलती है, उतनी श्रेष्ठ को नहीं। श्रेष्ठ हट-बचकर, साफ-सफाई के साथ जिंदगी को जीते हैं। भष्ट बेपरवाह और बिंदास होकर जिंदगी का मज़ा लेते हैं। श्रेष्ठ जेल जाने से भय खाता है। भष्ट खुलकर जेल जाता है। श्रेष्ठ के पांव होते हैं। भष्ट के पांव नहीं होते।
 दैनिक जागरण के दीपक जोशी जी अपने ब्लॉग पर  लिखते है की
पढ़ाई शुरु होने से लेकर पढ़ाई खत्म होने तक ,जो भी गणित पढ़ाई गई थी, उसमें सिर्फ यही पढ़ा था कि “दो धन दो चार होता है।”
यह सिर्फ हमनें ही नहीं सभी ने पढ़ा होगा। लेकिन यह दो+दो=चार में “भष्ट” कब जुड़ा पता ही नहीं चला ।
कहते है कि बूंद बूंद से मटका भरता है ….और शायद उसी तरह से यह भष्टाचार धीरे-धीरे पूरे समाज में भर चुका है।।
आज हमारा समाज इस भष्टाटचार के दलदल में इतना धंस चुका है कि हर वर्ग का इन्सान काफी हद तक इसकी चपेट में आ चुका है।
“भष्टाचार”, मैं इस शब्द कि व्याख्या तो नहीं कर पाऊँगा, पर मुझे लगता है कि यह एक ऐसी बिमारी है, जो आज एक छोटे से चाय के ढाबेवाले से लेकर किसी बड़ी कम्पनी के अधिकारी तक को लग(सर) चुकी है। हम यह नहीं कहते कि आज का हर इन्सान भष्ट है लेकिन जाने अनजाने में ही सही, पर वो इस भष्टाचारी समाज का हिस्सा बन चुका है।
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योगेश पाण्डेय
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