25 May, 2011

हे भ्रष्टाचार तोहार जय हो, विजय हो...

केन्द्रीय सतर्कता विभाग के पूर्व आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा भ्रष्टाचार से चिन्तित हवन। उनकर कहनाम बा- ‘हर तीसरा भारतीय भ्रष्ट’। हम कहता हई रिटायर भइला के बाद काहे बुद्धि खुलल ह। भ्रष्टाचार पर नजर रखे वाली विश्व स्तर के संस्था ट्रांसपरेन्सी इन्टरनेशनल जवन भ्रष्ट देशन के सूची बनवले बा ओहमा भारत के नंबर 84वां स्थान पर बा। इ दूनो बात सुन के हमार खोपड़ी पौराणिक काल की ओर घुमि गइल। सतयुग, द्वापर, त्रेता के एक-एक कहानी आंखि की सामने नाचेलागल। अचानक ना चाहते भी मुंह से निकर गईल- हे भ्रष्टाचार तोहार जय हो! विजय हो!
वइसे भ्रष्टाचार क शाब्दिक अर्थ ज्ञानी लोग गढ दिहलें जे अचार-विचार से भ्रष्ट उ भ्रष्टाचारी। ज्ञानी लोग भ्रष्टाचार की कई रूप-स्वरूप के बड़ी-बड़ी व्याख्या कइले हवें, यथा-लूट, डकैती, चोरी अपहरण, हत्या, झूठ, फरेब, धोखाधड़ी, विश्वासघात, रिश्वतखोरी, हरामखोरी, लालच, छल...। जैसे हरि के हजार नाम, वैसे भ्रष्टाचार के भी कयी नाम। येही से बंदा कहता- हे भ्रष्टाचार तोहार जय हो, विजय हो...।
धर्म में आस्था रखे वाला भाई-बहिनिन से माफी चाहत, भ्रष्टाचार के गुणगान के लिए कुछ उदाहरण अपने समझदानी से देत हईं। भगवान भोलेनाथ के लड़िकन, कार्तिकेय व गणेश में पृथ्वी के भ्रमण की होड़ लगल त गणेश महराज क चूहा षड़ानंद के मोर से भला कैसे तेज दौड़ सकत, सो गणेश जी ने माता-पिता के ही परिक्रमा क लिहलें। इ कौन इमानदारी ह भाई? श्रीहरि बामन रूप में राजा बलि से तीन डेग जमीन की बदला में तीनों लोक आ बलि के पीठ भी नपला लिहलें। हरिश्चन्द्र अइसन सत्यवादी के भ्रष्टाचार की जाल में फंसा के सांसत में डाल दिहल गइल। चक्रवर्ती सम्राट के डोम राजा की घरे बिकाये के पड़ल। बेटा बिकाइल, मेहरी नीलाम हो गइल। मरघट के रखवाली करे क पड़ल। गौतम ऋषि के नारी अहिल्या से देवतन के राजा इंद्र व चंद्रमा छल कइलें। रामजी, बाली के ताड़ की आड़ से मार दिहलें, इहो एगो छले ह। महाभारत काल में त भ्रष्टाचार के दुष्टान्त भरल पड़ल बा। पांच पति के एगो पत्नी...। जुआड़ी दांव पर लगा दिहलें। मामा शकुनी अइसन मकुनी पकवले की भांजा दुर्योधन के जितवा दिहलें। धृतराष्ट्री व्यवस्था में द्रोपदी क चीरहरण हो गइल। लाक्षागृह में आग लगवावल, चक्रव्यूह के रचना..., अभिमन्यु क वध...। इ सब भ्रष्टाचार ना त का ह?
 उपभोक्तावादी संस्कृति आ बाजारवाद की येह दुनिया में जे भ्रष्ट आचरण ना सीखी उ बउक कहाई। बच्चा ईमानदारी से परीक्षा दई त मेरिट में पिछड़ जाई। भ्रष्टाचार के गुणा-गणित वाला के देखीं कइसे छलांग लगावत, छरकत आगे बढल चल जात हवें। ई भ्रष्टाचार के ही कृपा बा कि जेकरा सलाखन की पीछे होखे के चाहीं उ सदन के सोभा बढ़ावत हवें। न्याय क मंदिर में जहां न्यायदेवता बैठल हवें ओहिजा पेशकार नाम क जीव रहले भेंट लेता, तब तारीख देता। येही से बंदा कहता- हे भ्रष्टाचार तोहार जय हो, विजय हो...

 नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती