Blockquote

Followers

08 November, 2012

दीवाली की हार्दिक शुभकामनाये





दीपावली की अनंत शुभ कामनाएँ ।

प्रकाश पर्व "दीपावली" आपके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ लेकर आये |


दीपावली के इस पावन अवसर पर आप सभी को और आपके समस्त पारिवारिकजनों को अपने और अपने Team की तरफ से दीपावली की ढेरों शुभकामनाये प्रेषित करता हूँ ! 
प्रेम से करना "गजानन-लक्ष्मी" आराधना।
आज होनी चाहिए "माँ शारदे" की साधना।।

अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।

आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!! 




प्रकाश पर्व "दीपावली" आपके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ लेकर आये |  
जिस तरह "दीपक" की "एक लो" "अमावस्या" की अँधेरी रात में उजाला भर देती हे ,उसी प्रकार  आपके जीवन के सारे अँधेरे दूर हो जाये और आपके जीवन में "उजाला ही उजाला" हो |  
आप अपने क्षेत्र में उच्चतम उंचाइयो  पर पंहुचे |
 इसी कामना के साथ आपको "दीपावली" की "ढेरो शुभकामनाये" |



आप लोगो के सुझाव और शिकायत की प्रतीक्षा में ...

VMW Team

The Team With Valuable Multipurpose Work
 vmwteam@live.com 
+91-9024589902 
+91-9044412246
+91-9261545777

03 November, 2012

अपने हि देश मे हक के लिऐ संघर्ष करती एक भाषा कि दास्तान

जिसे बोलते है 22 करोङ हिन्दूस्तानी,जिसे चाहने वालो कि संख्या है अधिक,मारीशस जैसे राष्ट्र कि एक प्रमुख भाषा है यह,हाँलैँड मे भी बोली जाती है यह,अब त आप लोग समझ गईल होईब जा काहेँ से कि ऊ भाषा ह भोजपुरी,भोजपुरी के नाम पर कई उठापटक बैठके भी हुईँ हैँ पर केहु भी भोजपुरी के रक्षा के संकल्प लेने के बाद क्यो नही करता है जन आंदोलन,भारतिय सियासत मे प्रमुख भुमीका निभावे वाली इ भाषा अपने देश मे हक पावे के खातिर संघर्ष कर रही है । महाराष्ट्र,गुजरात,असम जैसे प्रदेशो मे उन भारतियोँ को खास कर निशाना बनाया जाता है जो उत्तर भारत के होँ,वो भी बिहार और उत्तर प्रदेश के,क्योँकी ये लोग भोजपुरी से प्रेम करते हैँ । भोजपुरी को चाहते है । आज तक ये भाषा संविधान कि आठवीँ अनसुची मे सामिल नही हो पाई है । इसके जिम्मेदार हम भोजपुरी भाषी ही हैँ हमारे नेता जो वोट मागने आते हैँ उन्होने भी इस दिशा मे कोई उल्लेखनिय कार्य नही किया है । हाँ इंटरनेट पर कुछ वेबसाईट और ब्लागोँ ने इसे आगे बढाने का कार्य जरूर किया है । अभी भी समय है भाईयोँ जाग जाओ अपने मातृ भाषा और राष्ट्र भाषा को आगे बढाओँ,पर किसी भी अन्य भाषा का निरादर मत करो ।

अच्छा लगने पर ब्लॉग समर्थक बनकर मेरा उत्साहवर्द्धन एवं मार्गदर्शन करें | 
vmwteam@live.com +91-9024589902 +91-9044412246

दीपावली पर हम क्या-क्या कर सकते है ?

1. जिनकी याद में हम त्योंहार मना रहे हैं। उनके गुणों जैसे कर्तव्य पालन, पितृभक्ति, सत्य-अहिंसा आदि का पालन करे।
------------------
2. अज्ञान के अंधकार को दूर भगाकर ज्ञान का प्रकाश फैलायें। व्रत-नियम धारण करें, दूसरों को प्रेरणा दें। 
------------------
3. मंदिर में जाकर विशेष पूजा-अर्चना करें। लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरणा दे।
------------------
4. आज के दिन किसी भी जीव को न सताने, न मारने, न पीड़ा देने के साथ ही पशु-पक्षियों के प्रति उपकार भाव रखने का अभ्यास करना चाहिए तथा पूरे वर्ष के लिए ऐसा करने की भावना निभानी चाहिए।
------------------
5. तड़क-भड़क, दिखावा, आडम्बर, प्रदर्शन से दूर रहें।
------------------
6. पटाखें न चलायें। पटाखे चलाने में किसी से होड़ न करे।
------------------
7. गरीबों, असहायों, बीमारों, की सेवा करें, उन्हें भोजन, वस्त्र, दवा आदि दान में दें।
------------------
8. गरीब बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था करें, उन्हें कपड़े एवं पुस्तकें दें।
------------------
9. दीन-हीन निर्धनों को व्यापार एवं शिक्षा के अवसर उपलब्ध करवाकर उन्हें स्वयं के पैरों पर खड़ा करने में सहायता करे।
------------------
10. इस दिन कम से कम अपने आस-पड़ौस के पाँच लोगों को पटाखों की हानियों से परिचित करायें एवं पटाखा न फोड़ने के लिए प्रेरणा दें।
------------------
11. प्रतिज्ञा करें कि हमारे किसी भी कार्य से जीवन रक्षक पर्यावरण प्रदूषित न हो।
------------------
12. लौकिक दीपक के साथ-साथ अज्ञान-अंधकार मिटाते हुए अपने हृदय में ज्ञान का दीप जला कर पूर्ण ज्ञान प्राप्ति की भावना लायें।
------------------


आओ ज्ञान का दिया जलायें, अंधकार को दूर भगाएँ।
1. देश का अरबों रूपया व्यर्थ बर्बाद होता हैं, जिससे गरीबी बढ़ती है।
----------------
2. असावधानी के कारण घरों, दूकानों और कभी-कभी पूरे बाजार में आग लगने से अरबों रूपयों की सम्पत्ति स्वाहा हो जाती है। अनेक लोग जल जाते है।
----------------
3. पटाखें से जलने के कारण शरीर जल जाता है।
----------------
4. पटाखों की आवाज एवं बारूद के कारण आँख एवं कान खराब हो जाते है।
----------------
5. अस्थमा के रोगी इन दिनों घर से बाहर नहीं निकल पाते है। उन्हें अकारण अवांछित कैद-जेल में रहने को मजबूर होना पड़ता है।
----------------
6. आकाश में छोड़े जाने वाले पटाखों से अनेक पक्षी घायल हो जाते है या मारे जाते है
----------------
7. पटाखों के धमाकों से मूक पशु-पक्षियों को असह्य मानसिक वेदना सहन करनी पड़ती है।
----------------
8. अनन्त जीवों की हत्या होती है। पटाखों की आग से वे जीवित ही जल जाते है।
----------------
9. हवा में प्राणघातक विषैला धुआँ फैलता हैं, जिससे श्वाँस लेना मुश्किल हो जाता है।
----------------
10. घरों एवं अस्पतालों में बीमार व्यक्तियों/मरीजों को असीम वेदना सहन करनी पड़ती है।
----------------
11. पटाखों पर देवी-देवताओं, महापुरूषों के चित्र बने होते है। पटाखा फटने के बाद इन चित्रों के टुकड़े हो जाते है, जो गंदगी के साथ पड़े रहते है और हमारे ही पैरों तले कुचले जाते है। एक ओर महापुरूषों के आदर-सम्मान की बातें, दूसरी ओर यह कृत्य कितना शोभास्पद है।
----------------
12. चाइनीज पटाखों में हानिकारक केमिकल का प्रयोग होता है, जो बहुत ही नुकसानदायक होते है। हमें देशहित में भी विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए। फिर यह तो हमारे शरीर के लिए भी घातक है।




अच्छा लगने पर ब्लॉग समर्थक बनकर मेरा उत्साहवर्द्धन एवं मार्गदर्शन करें |
 vmwteam@live.com
 +91-9024589902 
+91-9044412246

22 October, 2012

अत्याचारी ने आज पुनः ललकारा,………..


अटल बिहारी बाजपेयी जी 
Siddharth Hinduveer

अत्याचारी ने आज पुनः ललकारा,………..


अत्याचारी ने आज पुनः ललकारा, 
अन्यायी का चलता है अमन दुधारा, 
आंखो के आगे सत्य मिटा जाता है, 
भारत माता का शीश कटा जाता है !
      (1)    क्या पुनः देश टुकड़ो में बंट जाएगा ? 
           क्या सबका शोणित पानी बन जाएगा?
    कब तक दानव की  माया  चलने  देंगे  ?  कब तक  भस्मासुर  को  हम  छलने  देंगे ?
कब   तक   जम्मू  को  हम  जलने  देंगे ? 
                          कब  तक  जुल्मो  की  मदिरा ठलने देंगे ?
चुपचाप  सहेंगे  कब  तक  लाठी  गोली ?  कब  तक  खेलेंगे  दुश्मन  खून  से  होली ?
प्रह्लाद-परीक्षा  की  बेला  अब आई ; होलिका  बनी  देखो  अब्दुल्ला शाही...................!!!
(2)   माँ बहनो का अपमान सहेंगे कब तक ?.......................?
माँ बहनो का अपमान सहेंगे कब तक? भोले पांडव चुपचाप रहेंगे कब तक ?
आखिर सहने की भी सीमा होती है, सागर के उर मे भी ज्वाला सोती है,
मलयानिल कभी बवंडर बन ही जाता,भोले शिव का तीसरा नेत्र खुल जाता,
(3)  जिनको जन धन से मोह , प्राण से ममता..............
जिनको जन धन से मोह , प्राण से ममता ;
वे दूर रहे अब पांचजन्य है बजता,
जो दुमुख, युद्ध कायर है,
रणभेरी सुनकर कंपित जिनके अंतर है,
वे दूर रहे चूड़िया पहन कर बेठें,
बहनें थूकें माताएँ कान उमेठें,……
जो मानसिंह के बल से सम्मुख आयें ,
फिर एक बार घर मे ही आग लगाएँ,
पर अन्यायी की लंका अब न रहेगी,
आने वाली सन्तानें यूं न कहेंगी ,
पुत्रों के रहते कटा जननी का माथा ,
चुप रहे देखते अन्यायों की गाथा,……
(4)   अब शोणित से इतिहास नया लिखना है..........
अब शोणित से इतिहास नया लिखना है, बलिपथ पर निर्भय पाँव आज रखना है,
आओ खंडित भारत के वासी आओ, कश्मीर बुलाता त्याग उदासी आओ,
लो सुनो शहीदो की पुकार आती है, अत्याचारी की सत्ता ठर्राती.............;
लो सुनो शहीदो की पुकार आती है, अत्याचारी की सत्ता ठर्राती,
उजड़े सुहाग की लाली तुम्हें बुलाती , अधजली चिता मतवाली तुम्हें बुलाती,
अस्थियाँ शहीदो की देती आमंत्रण, बलिवेदी पर कर दों सर्वस्व समर्पण,
कारागारों की दीवारों का न्योता, कैसी दुर्बलता अब कैसा समझौता,
हाथो मे लेकर प्राण चलो मतवालों, सीने मे लेकर आग चलो प्रणवालों,
जो कदम बढ़ा अब पीछे नहीं हटेगा, बच्चा बच्चा हंस हंस कर मरे मिटेगा,

बरसो के बाद आज बलि का दिन आया,अन्याय-न्याय का चिर संघर्षण छाया,
फिर एक बार दिल्ली की किस्मत जागी, जनता जागी अपमानित अस्मत जागी,
देखो दिल्ली की कीर्ति न कम हो जाये, कण कण पर फिर बलि की छाया छा जाये…………… 
ये  बाजपेयी जी की पंक्तिया हमारे VMW Team के सिद्धार्थ हिंदुवीर की तरफ से .......

अच्छा लगने पर ब्लॉग समर्थक बनकर मेरा उत्साहवर्द्धन एवं मार्गदर्शन करें |
 vmwteam@live.com +91-9024589902 +91-9044412246
+91-7737077617

08 October, 2012

CWG, 2G, कोयला और न जाने कितने जी.....जा......जी

 
एक बार की बात है,
वोट देते ही पड़ गई लात है|
थोड़े देर सकपकाने के बाद,
बोले निल्को भाई
वोट देने का क्या यही परिणाम है ?
मैंने कहा भाई,
तुम तो बहुत कमात हो
लेकिन मनमोहन सब खाए जात है
फिर वोट कांग्रेस को देकर
क्या संदेश देत जात हो ।
मैंने कहा सही है भाई,
लेकिन यह मौन का
क्या राज है ?
अरे जनाब,
CWG, 2G, कोयला
और न जाने
कितने जी.....जा......जी
तो इनके पास है।
खाने के वक्त बोलना नहीं चाहिए,
और पचाने के लिए विपक्ष को
जगाना नहीं चाहिए ।
इतने मे ही भाई नीलेश आए,
और बोले की
ये नोट मेरे पास
आया था,
देखने मे सफ़ेद पर अंदर से
काला था,
आप की बात सुनकर
समझ आया यह तो कांग्रेस का
छापा था,
गलती से यह मेरे पास
आया था ।


अच्छा लगने पर ब्लॉग समर्थक बनकर मेरा उत्साहवर्द्धन एवं मार्गदर्शन करें | 
vmwteam@live.com +91-9024589902 
+91-9044412246

28 September, 2012

ईमानदारी को बनाएं हथियार

जानकारी और ज्ञान में वही फर्क है, जो आंख और प्रकाश में है। प्रकाश यानी दृष्टि। दृष्टि न हो तो आंख किस काम की और ज्ञान न हो तो जानकारियों का वजन भी मनुष्य की चाल को बिगाड़ देगा। इन बातों का असर हमारे दो अभियानों पर भी पड़ा। भ्रष्टाचार और अपराध, देश के ये दो कलंक बिंदिया बनकर चिपक गए। जब दुर्गुण ही शृंगार बन जाए, तब चेहरे को विकृत होना ही है। भ्रष्टाचार मिटेगा ईमानदारी से। हमारे पास ईमानदारी जानकारी की शक्ल में है, ज्ञान के रूप में नहीं। इसलिए ईमानदारी को समझदारी से जोडऩा होगा। एक गहरी समझ के साथ इसे शस्त्र बनाकर बेईमानों पर प्रहार करना होगा। लोगों ने ईमानदारी को ढाल बना लिया, अब हथियार बनाना होगा। इसी तरह अपराध के मुकाबले के लिए जिम्मेदारी को बहादुरी से जोडऩा होगा। कर्तव्यनिष्ठ लोग साहस दिखाने के मामले में रिजर्व हो जाते हैं। यह बिल्कुल ऐसा है कि हमारे पास जिम्मेदारी की आंख है, पर बहादुरी की दृष्टि नहीं। अंधे होकर आखिर कितनी लंबी यात्राएं कर पाएंगे। इसीलिए बेईमानों की जानकारी भी ईमानदारों के ज्ञान पर भारी पड़ जाती है और अपराधियों की दृष्टि जिम्मेदारों की आंख पर हावी हो जाती है। आध्यात्मिकता ही इस गड़बड़ाए तालमेल को ठीक कर पाएगी।

अच्छा लगने पर ब्लॉग समर्थक बनकर मेरा उत्साहवर्द्धन एवं मार्गदर्शन करें | 
vmwteam@live.com +91-9024589902 +91-9044412246

27 September, 2012

मुसीबत में शरीफ़ों की शराफ़त

मुसीबत में शरीफ़ों की शराफ़त कम नहीं होती,
करो सोने के सौ टुकडे तो क़ीमत कम नहीं होती.
मुझे बचपन में ये सीख दी है मेरी मम्मी ने,
बुज़ुर्गों की दुआ लेने से इज्ज़त कभी कम नहीं होती.
जरूरतमंद को कभी देहलीज से ख़ाली ना लौटाओ,
भगवन के नाम पर देने से दौलत कम नहीं होती.
पकाई जाती है रोटी जो मेहनत के कमाई से,
हो जाए गर बासी तो भी लज्ज़त कम नहीं होती
याद करते है अपनी हर मुसीबत में जिन्हें हम
गुरु और प्रभु के सामने झुकने से गर्दन नीचे नहीं होती

जय हिंद ... वन्देमातरम .....

02 August, 2012

सुरमन- एक मां ऐसी जो ..........

अपने लिए जीएं तो क्या जीएं, ए दिल तू जी जमाने के लिए...कुछ इसी तरह का जज्बा इन दिनों हर देशवासी के दिल में पनप रहा है। सभी लोग बढ़- चढ़कर देश के लिए बहुत कुछ कर गुजरने की तमन्ना लिए आगे बढ़ने की चाहत रखते हैं। शहर में कई ऎसे लोग हैं, जिन्होंने कभी किसी के साथ की जरूरत महसूस नहीं की और आगे बढ़ते चले गए। आज उन्होंने साबित कर दिया है कि हम सभी में एक हीरो है। मतलब अगर समाज के लिए आप कुछ करना चाहते हैं तो कदम बढ़ाइए, दिशा अपने आप बनती चली जाएगी।
मां कौन होती है जो सिर्फ जन्म दे या फिर वो जो जीवन दे। जयपुर में एक मां ऐसी भी है जो ऐसे को बच्चों को जीवन दे रही है जिनका इस दुनिया में और कोई नहीं। वह हैं  मनन चतुर्वेदी..........
यशोदा बनकर मां के आंचल में छिपाना आसान काम नहीं है लेकिन मनन चतुर्वेदी को देखकर खुद यशोदा भी हैरान हो सकती है। मनन एक नहीं दो नहीं बल्कि कई  बच्चों की मां है।वो  जब  13 साल की थी तो अपनी मम्मी-पापा के साथ घूमने जा रही थी एक 13 साल का बच्चा उनके  पास भीख मांगने के लिए आया। वह उनके  जीवन का एक ऐसा हादसा था जिससे उन्हे  लगा कि हमारे पास सब कुछ है लेकिन इनके पास कुछ नहीं। उस दिन ने उनकी  जिंदगी में ऐसा बदलाव आया  कि आज वह कई  बच्चों की मां हैं । बच्चो के लिए उन्होने "सुरमन संस्थान" बनाया है , जहा बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ कई चीजे सीखते है ।  वो बताती है की - कुछ साल पहले फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद दिल्ली से आ रही थी, तभी एक जगह कूड़े के ढेर के पास एक बच्ची को खराब खाना खाते देखा। इस घटना ने मन को अंदर तक कचोट दिया। खुद से सवाल किया, जब लोगों के पास पहनने के लिए कपड़े ही नहीं तो मैं कपड़े डिजाइन आखिर किसके लिए करना चाहती हूं, यह कहना है सुरमन संस्थान की सैक्रेट्री मनन चतुर्वेदी का। वे बताती हैं, इस समय मैं करीबन 66 बच्चों की मां हूं। ये बच्चे मुझे मम्मी और एंजिल ऑफ लव कहकर पुकारते हैं। मेरे लिए यह बड़ी बात नहीं है कि मैंने इन्हें अपनाया है, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि इन्होंने मुझे अपनी मां की जगह दी है। आठ- नौ साल पहले जब सुरमन संस्थान शुरू किया था, तब कोई भी साथ नहीं था। लेकिन आज हमारे साथ कई लोग जुड़ चुके हैं, जो वॉलिएंट्री हमारी हैल्प करते हैं।
शुभकामना कार्ड छपाना, हस्तनिर्मित वस्तुओं की बिक्री, बोगन वेलिया नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन और चित्र बनाना जैसे कामों से होने वाली आय से पालना का खर्च चल रहा है। मनन के इस कार्य में कई दानदाताओं ने भी सहयोग दिया है।  वह सुरमन ग्राम का निर्माण करने की ओर अग्रसर हैं। जहां बच्चे, परित्यक्त महिलाएं एवं बेघर स्वाभिमान की जिंदगी जी सकें एवं खुली हवा में सांस ले सकें।


अच्छा लगने पर ब्लॉग समर्थक बनकर मेरा उत्साहवर्द्धन एवं मार्गदर्शन करें | 
vmwteam@live.com 
+91-9024589902 +91-9044412246

14 July, 2012

घमण्ड का पुतला


शाम हो गयी थी। मैं सरयू नदी के किनारे अपने कैम्प में बैठा हुआ नदी के मजे ले रहा था कि मेरे फुटबाल ने दबे पांव पास आकर मुझे सलाम किया कि जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहता है।
फुटबाल के नाम से जिस प्राणी का जिक्र किया गया वह मेरा अर्दली था। उसे सिर्फ एक नजर देखने से यक़ीन हो जाता था कि यह नाम उसके लिए पूरी तरह उचित है। वह सिर से पैर तक आदमी की शकल में एक गेंद था। लम्बाई-चौड़ाई बराबर। उसका भारी-भरकम पेट, जिसने उस दायरे के बनाने में खास हिस्सा लिया था, एक लम्बे कमरबन्द में लिपटा रहता था, शायद इसलिए कि वह इन्तहा से आगे न बढ़ जाए। जिस वक्त वह तेजी से चलता था बल्कि यों कहिए जुढ़कता था तो साफ़ मालूम होता था कि कोई फुटबाल ठोकर खाकर लुढ़कता चला आता है। मैंने उसकी तरफ देखकर पूछ- क्या कहते हो?
इस पर फुटबाल ने ऐसी रोनी सूरत बनायी कि जैसे कहीं से पिटकर आया है और बोला-हुजूर, अभी तक यहां रसद का कोई इन्तजाम नहीं हुआ। जमींदार साहब कहते हैं कि मैं किसी का नौकर नहीं हूँ।
मेंने इस निगाह से देखा कि जैसे मैं और ज्यादा नहीं सुनना चाहता। यह असम्भव था कि मलिस्ट्रेट की शान में जमींदार से ऐसी गुस्ताखी होती। यह मेरे हाकिमाना गुस्से को भड़काने की एक बदतमीज़ कोशिश थी। मैंने पूछा, ज़मीदार कौन है?
फुटबाल की बॉँछें खिल गयीं, बोला-क्या कहूँ, कुंअर सज्जनसिंह। हुजूर, बड़ा ढीठ आदमी है। रात आयी है और अभी तक हुजूर के सलाम को भी नहीं आया। घोड़ों के सामने न घास है न दाना। लश्कर के सब आदमी भूखे बैठे हुए हैं। मिट्टी का एक बर्तन भी नहीं भेजा।
मुझे जमींदारों से रात-दिन साबक़ा रहता था मगर यह शिकायत कभी सुनने में नहीं आयी थी। इसके विपरीत वह मेरी ख़ातिर-तवाजों में ऐसी जॉँफ़िशानी से काम लेते थे जो उनके स्वाभिमान के लिए ठीक न थी। उसमें दिल खोलकर आतिथ्य-सत्कार करने का भाव तनिक भी न होता था। न उसमें शिष्टाचार था, न वैभव का प्रदर्शन जो ऐब है। इसके बजाय वहॉँ बेजा रसूख की फ़िक्र और स्वार्थ की हवस साफ़ दिखायी देती भी और इस रसूख बनाने की कीमत काव्योचित अतिशयोक्ति के साथ गरीबों से वसूल की जाती थी, जिनका बेकसी के सिवा और कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं। उनके बात करने के ढंग में वह मुलामियत और आजिजी बरती जाती थी जिसका स्वाभिमान से बैर है और अक्सर ऐसे मौके आते थे, जब इन खातिरदारियों से तंग होकर दिल चाहता था कि काश इन खुशामदी आदमियों की सूरत न देखनी पड़ती।
मगर आज फुटबाल की ज़बान से यह कैफियत सुनकर मेरी जो हालत हुई उसने साबित कर दिया कि रोज-रोज की खातिरदारियों और मीठी-मीठी बातों ने मुझ पर असर किये बिना नहीं छोड़ा था। मैं यह हुक्म देनेवाला ही था कि कुंअर सज्जनसिंह को हाजिर करो कि एकाएक मुझे खयाल आया कि इन मुफ़्तखोर चपरासियों के कहने पर एक प्रतिष्ठित आदमी को अपमानित करना न्याय नहीं है। मैंने अर्दली से कहा-बनियों के पास जाओ, नक़द दाम देकर चीजें लाओ और याद रखो कि मेरे पास कोई शिकायत न आये।
अर्दली दिल में मुझे कोसता हुआ चला गया।
मगर मेरे आश्चर्य की कोई सीमा न रही, जब वहां एक हफ्ते तक रहने पर भी कुंअर साहब से मेरी भेंट न हुई। अपने आदमियों और लश्करवालों की ज़बान से कुंअर साहब की ढिठाई, घमण्ड और हेकड़ी की कहानियॉँ रोज सुना करता। और मेरे दुनिया देखे हुए पेशकार ने ऐसे अतिथि-सत्कार-शून्य गांव में पड़ाव डालने के लिए मुझे कई बार इशारों से समझाने-बुझाने की कोशिश की। ग़ालिबन मैं पहला आदमी था जिससे यह भूल हुई थी और अगर मैंने जिले के नक्शे के बदले लश्करवालों से अपने दौरे का प्रोग्राम बनाने में मदद ली होती तो शायद इस अप्रिय अनुभव की नौबत न आती। लेकिन कुछ अजब बात थी कि कुंअर साहब को बुरा-भला कहना मुझ पर उल्टा असर डालता था। यहॉँ तक कि मुझे उस अदमी से मुलामात करने की इच्छा पैदा हुई जो सर्वशक्तिमान् आफ़सरों से इतना ज्यादा अलग-थलग रह सकता है।


सूबह का वक्त था, मैं गढ़ी में गढ़ी में गया। नीचे सरयू नदी लहरें मार रही थी। उस पार साखू का जंगल था। मीलों तक बादामी रेत, उस पर खरबूज़ और तरबूज़ की क्यारियॉँ थीं। पीले-पीले फूलों-से लहराती हुई बगुलों और मुर्गाबियों के गोल-के-गोल बैठे हुए थे! सूर्य देवता ने जंगलों से सिर निकाला, लहरें जगमगायीं, पानी में तारे निकले। बड़ा सुहाना, आत्मिक उल्लास देनेवाला दृश्य था।
मैंने खबर करवायी और कुंअर साहब के दीवानखाने में दाखिल हुआ लम्बा-चौड़ा कमरा था। फर्श बिछा हुआ था। सामने मसनद पर एक बहुत लम्बा-तड़ंगा आदमी बैठा था। सर के बाल मुड़े हुए, गले में रुद्राक्ष की माला, लाल-लाल, ऊंचा माथा-पुरुषोचित अभिमान की इससे अच्छी तस्वीर नहीं हो सकती। चेहरे से रोबदाब बरसता था।
कुअंर साहब ने मेरे सलाम को इस अन्दाज से लिया कि जैसे वह इसके आदी हैं। मसनद से उठकर उन्होंने बहुत बड़प्पन के ढंग से मेरी अगवानी की, खैरियत पूछी, और इस तकलीफ़ के लिए मेरा शुक्रिया अदा रिने के बाद इतर और पान से मेरी तवाजो की। तब वह मुझे अपनी उस गढ़ी की सैर कराने चले जिसने किसी ज़माने में ज़रूरर आसफुद्दौला को ज़िच किया होगा मगर इस वक्त बहुत टूटी-फीटी हालत में थी। यहां के एक-एक रोड़े पर कुंअर साहब को नाज़ था। उनके खानदानी बड़प्पन ओर रोबदाब का जिक्र उनकी ज़बान से सुनकर विश्वास न करना असम्भव था। बयान करने का ढंग यक़ीन को मजबूर करता था और वे उन कहानियों के सिर्फ पासबान ही न थे बल्कि वह उनके ईमान का हिस्सा थीं। और जहां तक उनकी शक्ति में था, उन्होंने अपनी आन निभाने में कभी कसर नहीं की।
कुंअर सज्जनसिंह खानदानी रईस थे। उनकी वंश-परंपरा यहां-वहां टूटती हुई अन्त में किसी महात्मा ऋषि से जाकर मिल जाती थी। उन्हें तपस्या और भक्ति और योग का कोई दावा न था लेकिन इसका गर्व उन्हें अवश्य था कि वे एक ऋषि की सन्तान हैं। पुरखों के जंगली कारनामे भी उनके लिए गर्व का कुछ कम कारण न थे। इतिहास में उनका कहीं जिक्र न हो मगकर खानदानी भाट ने उन्हें अमर बनाने में कोई कसर न रखी थी और अगर शब्दों में कुछ ताकत है तो यह गढ़ी रोहतास या कालिंजर के किलों से आगे बढ़ी हुई थी। कम-से-कम प्राचीनता और बर्बादी के बाह्म लक्षणों में तो उसकी मिसाल मुश्किल से मिल सकती थी, क्योंकि पुराने जमाने में चाहे उसने मुहासरों और सुरंगों को हेच समझा हो लेकिन वक्त वह चीटियों और दीमकों के हमलों का भी सामना न कर सकती थी।
कुंअर सज्जनसिंह से मेरी भेंट बहुत संक्षिप्त थी लेकिन इस दिलचस्प आदमी ने मुझे हमेशा के लिए अपना भक्त बना लिया। बड़ा समझदार, मामले को समझनेवाला, दूरदर्शी आदमी था। आखिर मुझे उसका बिन पैसों का गुलाम बनना था।


बरसात में सरयू नदी इस जोर-शोर से चढ़ी कि हज़ारों गांव बरबाद हो गए, बड़े-बड़े तनावर दरख्त़ तिनकों की तरह बहते चले जाते थे। चारपाइयों पर सोते हुए बच्चे-औरतें, खूंटों पर बंधे हुए गाय और बैल उसकी गरजती हुई लहरों में समा गए। खेतों में नाच चलती थी।
शहर में उड़ती हुई खबरें पहुंचीं। सहायता के प्रस्ताव पास हुए। सैकड़ों ने सहानुभूति और शौक के अरजेण्ट तार जिल के बड़े साहब की सेवा में भेजे। टाउनहाल में क़ौमी हमदर्दी की पुरशोर सदाएं उठीं और उस हंगामे में बाढ़-पीड़ितों की दर्दभरी पुकारें दब गयीं।
सरकार के कानों में फरियाद पहुँची। एक जांच कमीशन तेयार किया गया। जमींदारों को हुक्म हुआ कि वे कमीशन के सामने अपने नुकसानों को विस्तार से बतायें और उसके सबूत दें। शिवरामपुर के महाराजा साहब को इस कमीशन का सभापति बनाया गया। जमींदारों में रेल-पेल शरू हुई। नसीब जागे। नुकसान के तखमीन का फैलला करने में काव्य-बुद्धि से काम लेना पड़ा। सुबह से शाम तक कमीशन के सामने एक जमघट रहता। आनरेबुल महाराजा सहब को सांस लेने की फुरसत न थी दलील और शाहदत का काम बात बनाने और खुशामद से लिया जाता था। महीनों यही कैफ़ियत रही। नदी किनारे के सभी जमींदार अपने नुकसान की फरियादें पेश कर गए, अगर कमीशन से किसी को कोई फायदा नहीं पहुँचा तो वह कुंअर सज्जनसिहं थे। उनके सारे मौजे सरयू के किनारे पर थे और सब तबाह हो गए थे, गढ़ी की दीवारें भी उसके हमलों से न बच सकी थीं, मगर उनकी जबान ने खुशामद करना सीखा ही न था और यहां उसके बगैर रसाई मुश्किल थी। चुनांचे वह कमीशन के सामने न आ सके। मियाद खतम होने पर कमीशन ने रिपोर्ट पेश की, बाढ़ में डूबे हुए इलाकों में लगान की आम माफी हो गयी। रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ सज्जनसिंह वह भाग्यशाली जमींदार थे। जिनका कोई नुकसान नहीं हुआ था। कुंअर साहब ने रिपोर्ट सुनी, मगर माथे पर बल न आया। उनके आसामी गढ़ी के सहन में जमा थे, यह हुक्म सुना तो रोने-धोने लगे। तब कुंअर साहब उठे और बुलन्द आवाजु में बोले-मेरे इलाके में भी माफी है। एक कौड़ी लगान न लिया जाए। मैंने यह वाकया सुना और खुद ब खुद मेरी आंखों से आंसू टपक पड़े बेशक यह वह आदमी है जो हुकूमत और अख्तियार के तूफान में जड़ से उखड़ जाय मगर झुकेगा नहीं।


वह दिन भी याद रहेगा जब अयोध्या में हमारे जादू-सा करनेवाले कवि शंकर को राष्ट्र की ओर से बधाई देने के लिए शानदार जलसा हुआ। हमारा गौरव, हमारा जोशीला शंकर योरोप और अमरीका पर अपने काव्य का जादू करके वापस आया थां अपने कमालों पर घमण्ड करनेवाले योरोप ने उसकी पूजा की थी। उसकी भावनाओं ने ब्राउनिंग और शेली के प्रेमियों को भी अपनी वफ़ा का पाबन्द न रहने दिया। उसकी जीवन-सुधा से योरोप के प्यासे जी उठे। सारे सभ्य संसार ने उसकी कल्पना की उड़ान के आगे सिर झुका दिये। उसने भारत को योरोप की निगाहों में अगर ज्यादा नहीं तो यूनान और रोम के पहलू में बिठा दिया था।
जब तक वह योरोप में रहा, दैनिक अखबारों के पत्रे उसकी चर्चा से भरे रहते थे। यूनिवर्सिटियों और विद्वानों की सभाओं ने उस पर उपाधियों की मूसलाधार वर्षा कर दी। सम्मान का वह पदक जो योरोपवालों का प्यारा सपना और जिन्दा आरजू है, वह पदक हमारे जिन्दादिल शंकर के सीने पर शोभा दे रहा था और उसकी वापसी के बाद उन्हीं राष्ट्रीय भावनाओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए हिन्दोस्तान के दिल और दिमाग आयोध्या में जमा थे।
इसी अयोध्या की गोद में श्री रामचंद्र खेलते थे और यहीं उन्होंने वाल्मीकि की जादू-भरी लेखनी की प्रशंसा की थी। उसी अयोध्या में हम अपने मीठे कवि शंकर पर अपनी मुहब्बत के फूल चढ़ाने आये थे।
इस राष्ट्रीय कतैव्य में सरकारी हुक्काम भी बड़ी उदारतापूर्वक हमारे साथ सम्मिलित थे। शंकर ने शिमला और दार्जिलिंग के फरिश्तों को भी अयोध्या में खींच लिया था। अयोध्या को बहुत अन्तजार के बाद यह दिन देखना नसीब हुआ।
जिस वक्त शंकर ने उस विराट पण्डाल में पैर रखा, हमारे हृदय राष्ट्रीय गौरव और नशे से मतवाले हो गये। ऐसा महसूस होता था कि हम उस वक्त किसी अधिक पवित्र, अधिक प्रकाशवान् दुनिया के बसनेवाले हैं। एक क्षण के लिए-अफसोस है कि सिर्फ एक क्षण के लिए-अपनी गिरावट और बर्बादी का खयाल हमारे दिलों से दूर हो गया। जय-जय की आवाजों ने हमें इस तरह मस्त कर दिया जैसे महुअर नाग को मस्त कर देता है।
एड्रेस पढ़ने का गौरव मुझको प्राप्त हुआ था। सारे पण्डाल में खामोशी छायी हुई थी। जिस वक्त मेरी जबान से यह शब्द निकले-ऐ राष्ट्र के नेता! ऐ हमारे आत्मिक गुरू! हम सच्ची मुहब्बत से तुम्हें बधाई देते हैं और सच्ची श्रद्धा से तुम्हारे पैरों पर सिर झुकाते हैं...यकायक मेरी निगाह उठी और मैंने एक हृष्ट-पुष्ट हैकल आदमी को ताल्लुकेदारों की कतार से उठकर बाहर जाते देखा। यह कुंअर सज्जन सिंह थे।
मुझे कुंअर साहब की यह बेमौक़ा हरकत, जिसे अशिष्टता समझने में कोई बाधा नहीं है, बुरी मालूम हुई। हजारों आंखें उनकी तरफ हैरत से उठीं।
जलसे के खत्म होते ही मैंने पहला काम जो किया वह कुंअर साहब से इस चीज के बारे में जवाब तलब करना था।
मैंने पूछा-क्यों साहब आपके पास इस बेमौका हरकत का क्या जवाब है?
सज्जनसिंह ने गम्भीरता से जवाब दिया-आप सुनना चाहें तो जवाब हूँ।
‘‘शौक से फरमाइये।’’
‘‘अच्छा तो सुनिये। मैं शंकर की कविता का प्रेमी हूँ। शंकर की इज्जत करता हूँ, शंकर पर गर्व करता हूँ, शंकर को अपने और अपनी कौम के ऊपर एहसान करनेवाला समझता हूँ मगर उसके साथ ही उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानने या उनके चरणों में सिर झुकाने के लिए तैयार नहीं हूँ।’’
मैं आश्चर्य से उसका मुंह ताकता रह गया। यह आदमी नहीं, घमण्ड का पुतला हैं देखें यह सिर कभी झुकता या नहीं।


पूरनमासी का पूरा चांद सरयू के सुनहरे फर्श पर नाचता था और लहरें खुशी से गलु मिल-मिलकर गाती थीं। फागुन का महीना था, पेड़ों में कोपलें निकली थीं और कोयल कूकने लगी थी।
मैं अपना दौरा करके सदर लौटता था। रास्ते में कुंअर सज्जनसिंह से मिलने का चाव मुझे उनके घर तक ले गया, जहां अब मैं बड़ी बेतकल्लुफी से जाता-आता था।
मैं शाम के वक्त नदी की सैर को चला। वह प्राणदायिनी हवा, वह उड़ती हुई लहरें, वह गहरी निस्तबधता-सारा दृश्य एक आकर्षक सुहाना सपना था। चांद के चमकते हुए गीत से जिस तरह लहरें झूम रही थीं, उसी तरह मीठी चिन्ताओं से दिल उमड़ा आता था।
मुझे ऊंचे कगार पर एक पेड़ के नीचे कुछ रोशनी दिखायी दी। मैं ऊपर चढ़ा। वहां बरगद की घनी छाया में धूनी जल रही थी। उसके सामने एक साधू पैर फैलाये बरगद की एक मोटी जटा के सहारे लेटे हुए थे। उनका चमकता हुआ चेहरा आग की चमक को लजाता था। नीले तालाब में कमल खिला हुआ था।
उनके पैरों के पास एक दूसरा आदमी बैठा हुआ था। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। वह उस साधू के पेरों पर अपना सिर रखे हुए था। पैरों को चूमता था और आंखों से लगता था। साधू अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रखे हुए थे कि जैसे वासना धैर्य और संतोष के आंचल में आश्रय ढूंढ़ रही हो। भोला लड़का मां-बाप की गोद में आ बैठा था।
एकाएक वह झुका हुआ सर उठा और मेरी निगाह उसके चेहरे पर पड़ी। मुझे सकता-सा हो गया। यह कुंअर सज्जनसिंह थे। वह सर जो झुकना न जानता था, इस वक्त जमीन छू रहा था।
वह माथा जो एक ऊंचे मंसबदार के सामने न झुका, जो एक प्रतानी वैभवशाली महाराज के सामने न झुका, जो एक बड़े देशप्रेमी कवि और दार्शनिक के सामने न झूका, इस वक्त एक साधु के क़दमों पर गिरा हुआ था। घमण्ड, वैराग्य के सामने सिर झुकाये खड़ा था।
मेरे दिल में इस दृश्य से भक्ति का एक आवेग पैदा हुआ। आंखों के सामने से एक परदा-सा हटा और कुंअर सज्जन सिंह का आत्मिक स्तर दिखायी दिया। मैं कुंअर साहब की तरफ से लिपट गया और बोला-मेरे दोस्त, मैं आज तक तुम्हारी आत्मा के बड़प्पन से बिल्कुल बेखबर था। आज तुमने मेरे हुदय पर उसको अंकित कर दिया कि वैभव और प्रताप, कमाल और शोहरत यह सब घटिया चीजें हैं, भौतिक चीजें हैं। वासनाओ में लिपटे हुए लोग इस योग्य नहीं कि हम उनके सामने भक्ति से सिर झुकायें, वैराग्य और परमात्मा से दिल लगाना ही वे महान् गुण हैं जिनकी ड्यौढ़ी पर बड़े-बड़े वैभवशाली और प्रतापी लोगों के सिर भी झुक जाते हैं। यही वह ताक़त है जो वैभव और प्रताप को, घमण्ड की शराब के मतवालों को और जड़ाऊ मुकुट को अपने पैरों पर गिरा सकती है। ऐ तपस्या के एकान्त में बैठनेवाली आत्माओ! तुम धन्य हो कि घमण्ड के पुतले भी पैरों की धूल को माथे पर चढ़ाते हैं।
कुंअर सज्जनसिंह ने मुझे छाती से लगाकर कहा-मिस्टर वागले, आज आपने मुझे सच्चे गर्व का रूप दिखा दिया और में कह सकता हूँ कि सच्चा गर्व सच्ची प्रार्थना से कम नहीं। विश्वास मानिये मुझे इस वक्त ऐसा मालूम होता है कि गर्व में भी आत्मिकता को पाया जा सकता है। आज मेरे सिर में गर्व का जो नशा है, वह कभी नहीं था।
Loading...