20 April, 2013

......बदल गया देखने का नज़रिया !



कई दिनों से किसी व्यक्ति विशेष पर रख रहा था नज़र
लेकिन हरकते देख कर
मन बोला
लोग बदले, ज़माने बदले
पर तुम न बदलो नज़रिया
क्योकि
तुम तो ठहरे ग्रामीण सहरिया
वे लोग जो भेष बदला करते है
‘निल्को’ उन्हें द रियल हीरो कहा करते है
जिनकी जिन्दगी ही फिल्मी हो जाये
अपने घर के ही पडोसी हो जाये
तो ‘मधुलेश’ की एक बात याद रखना
की कितना ही बड़ा पेड़ हो जाये ,
आखिर उसे गिरना तो आसमान में नहीं
धरती पर ही जगह मिलती है
इन सब बातो से लगा की
सचमुच ही जमाना भी तो बदल रहा है
किन्तु इस दौड़ में कम तो आप भी नहीं है
अब तो चार घंटे की ही चांदनी
के बाद अँधेरी काली रात है
फिर क्यों अपनो को पराये
बनाने के लिए लोग परेशान है
कविता तो शायद ‘सहज’ लगे
लेकिन इसका ‘श्रेय’ किसको जाता है
यह तो नज़रिये का खेल है
कभी ‘रियल’ तो कभी ‘आशियाना’ नज़र आता है .

v मधुलेश पाण्डेय निल्को
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