23 August, 2014

मैं कवि नहीं हूँ


जब भी मैं कोई कविता पढ़ता हूँ

मेरे मन में ख्याल आता है

इतनी अच्छी रचना मेरे द्वारा क्यो नहीं ...?

‘निल्को ‘की नज़र के सामने

किताबों के पन्नो में

वो शब्दो का समूह

जिसमे कभी प्रेम

तो कभी आक्रोश

कभी बनता बिगड़ता वाक्य

बार – बार यही कहता है

मैं कवि नहीं हूँ

दरअसल कविता मन का भाव है

कवि के जीवन का सार है

रचना भले की

किसी रूप रंग की हो

उसकी नज़रिये का माध्यम

तो तुम ही हो

पर मन अनायास ही

कह उठता है

मैं कवि नहीं हूँ



एम के पाण्डेय ‘निल्को’


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