12 April, 2015

ज़िन्दगी है एक पहेली - एम के पाण्डेय निल्को



गांव में छोड़ आये वो बड़ी सी हवेली

शहरो में ढूंढते है वो एक सहेली

आराम या हराम से जिए जा रहे है

पर कौन समझाए की ज़िन्दगी है एक पहेली



छप रहे थे वो बन कर ख़बरे

कुछ लोग खड़े द्वार बन पहरे

उनका बनना और बिगड़ना मंज़ूर तो था की

क्योकि हम इस रफ़्तार में भी ठहरे



बढ़ चले वो प्रगति के पथ पर

अर्थ नहीं समझे वो इस अर्थ पर

जीतनी रफ़्तार से वो निखर रहे थे

आज देख रहा हूँ उन्हें इस फर्श पर



लोग बाज़ार में आकर बिक भी गए

हमारी कीमत भी वो लगा कर भी गए

पर आज बस इतना कहेगा ये निल्को

की वो तो लोगो के पान की पिक से भी गए
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एम के पाण्डेय निल्को

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