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18 September, 2017

आख़िर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान

हाल ही में भारत के बोधगया में हुए बम विस्फोटों के बाद रोहिंग्या मुस्लिम सुर्खियों में हैं, लेकिन प्रश्न यह भी है कि आखिर रोहिंग्या हैं कौनम्यांमार को क्या दिक्क़त है? इन्हें अब तक नागरिकता क्यों नहीं मिली? रोहिंग्या मुसलमान विश्‍व का सबसे अल्‍पसंख्‍यक समुदाय है। इनकी आबादी करीब दस लाख के बीच है। बौद्ध बहुल देश म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमान शताब्दियों से रह रहे हैं। बीते दिनो म्‍यांमार में हुई हिंसा में रोहिंग्‍या मुसलमानों के मारे जाने के बाद पूरे विश्‍व की नजरे इन पर आ गईं हैं। यह सुन्नी इस्लाम को मानते हैं। इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को बिना अधिकारियों की अनुमति के अपनी बस्तियों और शहरों से देश के दूसरे भागों में आने जाने की इजाजत नहीं है। यह लोग बहुत ही निर्धनता में झुग्गी झोपड़ियों में रहने के लिए मजबूर हैं। पिछले कई दशकों से इलाके में किसी भी स्कूल या मस्जिद की मरम्मत की अनुमति नहीं दी गई है। नए स्कूल, मकान, दुकानें और मस्जिदों को बनाने की भी रोहिंग्या मुसलमानों को इजाजत नहीं है। म्यांमार में 25 अगस्त को भड़की हिंसा में क़रीब 400 मौतों की ख़बर है म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक हैं और ये रोहिंग्या को अप्रवासी मानते हैं। साल 2012 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या-बौद्धों के बीच भारी हिंसा हुई थी साल 2015 में भी रोहिंग्या मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ, रोहिंग्या समुदाय 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस तो गया, लेकिन स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय ने उन्हें आज तक नहीं अपनाया है।

अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक रोहिंग्या रखाइन में प्राचीन काल से रह रहे हैं। 1824 से 1948 तक ब्रिटिश राज के दौरान आज के भारत और बांग्लादेश से एक बड़ी संख्या में मजदूर वर्तमान म्यांमार के इलाके में ले जाए गए। ब्रिटिश राज म्यांमार को भारत का ही एक राज्य समझता था इसलिए इस तरह की आवाजाही को एक देश के भीतर का आवागमन ही समझा गया। ब्रिटेन से आजादी के बाद, इस देश की सरकार ने ब्रिटिश राज में होने वाले इस प्रवास को गैर कानूनी घोषित कर दिया। इसी आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। जिसके चलते अधिकांश बौद्ध रोहिंग्या मुसमानों को बंगाली समझने लगे और उनसे नफरत करने लगे।

भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान हैं, जो जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मौजूद हैं।  चूंकि भारत ने शरणार्थियों को लेकर हुई संयुक्त राष्ट्र की 1951 शरणार्थी संधि और 1967 में लाए गए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इसलिए देश में कोई शरणार्थी कानून नहीं हैं । गौरतलब है कि भारत सरकार रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण देने से इनकार कर रही हैसरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि, "रोहिंग्या मुसलमान देश की सुरक्षा के लिए खतरा है और इस समुदाय के लोग आतंकी संगठनों से भी जुड़े हो सकते हैं"हालांकि, कोर्ट से सरकार ने इसे होल्ड करने की अपील की है

एम के पाण्डेय निल्को
रिसर्च स्कॉलर, जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी 

02 September, 2017

....या फिर तुम्हारी यादें



तुम या फिर तुम्हारी यादें

जब जब आती है
एक सुखद एहसास मेरे मन को
छू कर भाग जाती है
भाग जाती है
क्योकि
वो रुक नही सकती
और मैं उसे
रोक नही सकता
उस क्षणिक समय में
खो जाते है
हम दोनों 
जी हाँ , सही सुन रहे है
हम दोनों
मैं और मेरी तन्हाइयां
क्योंकि यही तो साथ देती है
पहले से थी और 
बाद तक साथ रहेगी
यही तो है जो अपना है
जो साथ है
जो साथ रहेगा 
सुनाऊंगा किसी रोज
एक दूसरा किस्सा
जिसका तू ही होगा एक हिस्सा
मेरी खामोशियों को न तोड़ो
भादो का महीना है
वर्षा से कही आफत है तो
कही राहत है
क्या सुनाऊ
क्या लिखूं
सोच रहा हूँ यही छोड़ 
देता हूँ जो है
वो किस्मत के 
भरोसे
या करे संघर्ष 
मिलते है इस आधी अधूरी
बिना सिर पैर की
रचना के बाद
-
एम के पाण्डेय निल्को

30 August, 2017

Junior Dr Kumar Vishwas


18 August, 2017

तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा

स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में सुभाष चंद्र बोस  का नाम भी आता है, नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था. जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी.
“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था, उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहुत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी.

11 August, 2017

कौन है यह चोटीकटवा ? जानें पूरा सच...!

बीते कई दिनों से चर्चाओं में आए चोटी कटवा को लेकर हर कोई सच्चाई जानना चाहता है । हर कोई जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा?  इसको लेकर बड़े-बड़े टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और वेब मीडिया में भी सुर्खियां बनी हुई है । तो वही सरकार से लेकर पुलिस प्रशासन भी चोटी कटवा को लेकर हैरान है, और जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा? सर्च करने पर पता चला कि राजस्थान से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली, गुडगांव, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित अलग-अलग जगहों से भी आ रही हैं, समझ आया कि मसला मास हिस्टीरियाका है ।
राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली हरियाणा चंडीगढ़ पंजाब होते होते देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जा पहुंची है। यहां के मथुरा, आगरा, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, देवरिया समेत कई शहर चोटी कटवा से दहशत जदां है । यहां के कई गांवों से चोटी कटवा नाम की अफवाह से सनसनी मची हुई है । इससे सबसे ज्यादा दहशत में महिलाएं हैं, और अपनी चोटी बचाने को लेकर हैरान हैं। क्योंकि उसकी किसी ना किसी पड़ोसी गांव में या पड़ोसी की चोटी कट गई है , और अब वह भी दहशत में है। सच तो यह है कि 2017 में भी हम ऐसे हैं कि हमारे बीच मास हिस्टीरिया फैलाना बहुत आसान है।  आप सोचिए कि कौन सा भूत ऐसे लोगों की चोटी काटते फिरेगा?  कैमरे के सामने आने के लिए क्या लोग ये नहीं कर सकते?  या फिर बस डर के मारे?  मैं नहीं कह रहा कि ऐसा ही है, पर ऐसा भी हो सकता है। यूजीन इनस्को (फ्रेंच लेखक) की किताब राइनोसोर्स  की कहानी याद आ गई, ऐसा होता है कि एक आदमी शहर में राइनोसोर्स बन जाता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और धीरे-धीरे बाकी सब। ये चोटीकटवा की कहानी कुछ ऐसी ही लगती है. इसके कई तर्क हो सकते हैं,  पब्लिसिटी,  धार्मिक संवेदना फैलाना,  मास हिस्टीरिया फैलाना। कुछ भी हो सकता है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि हम जरा सोचे कि कहीं हम सब राइनोसोर्स तो नहीं बन रहे?
अपने आसपास के माहौल में अफवाहों की चपेट में आकर लोग एक्यूट साइकोसिस (मेनिया) की जद में आकर मास हिस्टीरिया का शिकार हो रहे हैं। इसमें कोई अंजान डर एक से दूसरे में पहुंचकर अफवाहों को बढ़ावा देता है। मास हिस्टीरिया की उन जगहों पर होने की आशंका ज्यादा रहती है जहां परिवार या समाज में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें पीड़ित को देखकर परिवार या अन्य आसपास के सदस्य खुद को उसी में ढालने की कोशिश करते हैं।  मास हिस्टीरिया एक सामान्य समस्या है। इसमें यदि एक बच्चा शिकायत करता है कि उसे पेट दर्द हो रहा है तो अन्य बच्चों को भी लगता है कि उनके साथ भी वैसा ही हो रहा है। जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। हिस्टीरिया (Hysteria) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। बहुधा ऐसा कहा जाता है, हिस्टीरिया अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है। अवचेतन अंतर्द्वंद्र से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक, शरीरक्रिया संबंधी एवं मनोवैज्ञानिक लक्षणों में परिवर्तित हो जाती है। 
-
एम के पाण्डेय निल्को
शोध छात्र 

07 August, 2017

वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें।

प्रकृति की एक ताक़त होती है, आपने भी अनुभव किया होगा कि बहुत थक करके आए हो और एक गिलास भर पानी अगर मुहँ पर छिड़क दें, तो कैसी freshness आ जाती है। बहुत थक करके आए हो, कमरे की खिड़कियाँ खोल दें, दरवाज़ा खोल दें, ताज़ा हवा की सांस ले लें – एक नयी चेतना आती है। जिन पंच महाभूतों से शरीर बना हुआ है, जब उन पंच महाभूतों से संपर्क आता है, तो अपने आप हमारे शरीर में एक नयी चेतना प्रकट होती है, एक नयी ऊर्जा प्रकट होती है। ये हम सबने अनुभव किया है, लेकिन हम उसको register नहीं करते हैं, हम उसको एक धागे में, एक सूत्र में जोड़ते नहीं हैं। इसके बाद आप ज़रूर देखना कि आपको जब-जब प्राकृतिक अवस्था से संपर्क आता होगा, आपके अन्दर एक नयी चेतना उभरती होगी और इसलिए 5 जून का प्रकृति के साथ जुड़ने का वैश्विक अभियान, हमारा स्वयं का भी अभियान बनना चाहिये। पर्यावरण की रक्षा हमारे पूर्वजों ने की, उसका कुछ लाभ हमें मिल रहा है। अगर हम रक्षा करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिलेगा। वेदों में पृथ्वी और पर्यावरण को शक्ति का मूल माना गया है। हमारे वेदों में इसका वर्णन मिलता है। और अथर्ववेद तो पूरी तरह, एक प्रकार से पर्यावरण का सबसे बड़ा दिशा-निर्देशक ग्रंथ है और हज़ारों साल पहले लिखा गया है। हमारे यहाँ कहा गया है – ‘माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः’। वेदों में कहा गया है कि हम में जो purity है वह हमारी पृथ्वी के कारण है। धरती हमारी माता है और हम उनके पुत्र हैं। अगर हम भगवान् बुद्ध को याद करें तो एक बात ज़रूर उजागर होती है कि महात्मा बुद्ध का जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और उनका महा-परिनिर्वाण, तीनों पेड़ के नीचे हुआ था। हमारे देश में भी अनेक ऐसे त्योहार, अनेक ऐसी पूजा-पद्धति, पढ़े-लिखे लोग हों, अनपढ़ हो, शहरी हो, ग्रामीण हो, आदिवासी समाज हो, प्रकृति की पूजा, प्रकृति के प्रति प्रेम एक सहज समाज जीवन का हिस्सा है लेकिन हमें उसे आधुनिक शब्दों में आधुनिक तर्कों के साथ संजोने की ज़रूरत है। सभी राज्यों में वर्षा आते ही वृक्षारोपण का एक बहुत बड़ा अभियान चलता है। करोड़ों की तादात में पौधे लगाये जाते हैं। स्कूल के बच्चों को भी जोड़ा जाता है, समाज-सेवी संगठन जुड़ते हैं, NGOs जुड़ते हैं, सरकार स्वयं initiative लेती है। हम भी इस बार इस वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें। जितने भी लोकप्रिय व्यक्ति हैं वह पेड लगाये ओर इस मुहिम को आगे बढ़ाने में सहायक बने। सरकार द्वारा लाखों पेड़ फाइलों में लगते है ज़मीन पर नही। और वही लाखों पेड़ों की फाइल के कागज बनाने के लिए एक पेड़ और काट दिया जाता है आज देश में एक और हरित क्रांति की आवश्यकता है जय हिंद।

01 August, 2017

इस बरसात के मौसम मे


आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।
v मधुलेश पाण्डेय 'निल्को'



08 July, 2017

गुरुपूर्णिमा 9 जुलाई - गुरु गूंगे गुरू बावरे गुरू के रहिये दास


एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए !
भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो !

जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो !

भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है !

यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! नारायण! बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !

नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ?

यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया !

मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस भगवान के पास गए और कहा हे भगवान! मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !

यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान! इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये !भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !
नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है !
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !

गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा "स्वयं गुरु" भी नहीं कर सकते !

एक प्रसंग है कि एक पंडीत ने धन्ने भगत को एक साधारण पत्थर देकर कहा  इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देगे ! उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए ! फिर गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है।

01 June, 2017

VMW Team - शून्य एक हक़ीकत -

शून्य एक हक़ीकत तो क़रीब क़रीब हर पढ़े लिखे व्यक्ति पर उजागर है कि अंकगणित की दुनिया के इस हीरो, जिसे अंग्रेजी में ज़ीरो कहा जाता है का जन्म भारत में हुआ था। शून्य दरअसल क्या है? शून्य के आकार पर गौर करें। गोलाकार मण्डल की आकृति यूँ ही नहीं है। उसके खोखलेपन, पोलेपन पर गौर करें। एक सरल रेखा के दोनों छोर एक निर्दिष्ट बिन्दु की ओर बढ़ाते जाइए और फिर उन्हें मिला दीजिए। यह बन गया शून्य। यह शून्य बना है संस्कृत की ‘शू’ धातु से जिसमें फूलने, फैलने, बढ़ने, चढ़ने, बढ़ोतरी, वृद्धि, उठान, उमड़न और स्फीति का भाव है। स्पष्ट है कि शू से बने शून्य में बाद में चाहे निर्वात, सूनापन, अर्थहीन, खोखला जैसे भाव उसकी आकृति की वजह से समाविष्ट हुए हों, मगर दाशमिक प्रणाली को जन्म देने वालों की निगाह में शून्य में दरअसल फूलने-फैलने, समृद्धि का आशय ही प्रमुख था। इसीलिए यह शून्य जिस भी अंक के साथ जुड़ जाता है, उसकी क्षमता को दस गुना बढ़ा देता है, अर्थात अपने गुण के अनुसार उसे फुला देता है। जब इसके आगे से अंक या इकाई गायब हो जाती है, तब यह सचमुच खोखलापन, निर्वात, शून्यता का बोध कराता है। शून्य के आकार में भी यही सारी विशेषताएँ समाहित हैं। गोलाकार, वलयाकार जिसमें लगातार विस्तार का, फैलने का, वृद्धि का बोध होता है। दरअसल शून्य ही समृद्धि और विस्तार का प्रतीक है।


https://youtu.be/D9NUxnrj-Es


यह महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के बचपन की घटना है। एक बार गणित की कक्षा में अध्यापक ने ब्लैकबोर्ड पर तीन केले बनाए और पूछा- यदि हमारे पास तीन केले हों और तीन विद्यार्थी, तो प्रत्येक विद्यार्थी के हिस्से में कितने केले आएंगे? एक बालक ने तपाक से जवाब दिया- प्रत्येक विद्यार्थी को एक-एक केला मिलेगा। अध्यापक ने कहा-बिल्कुल ठीक। अभी भाग देने की क्रिया को अध्यापक आगे समझाने ही जा रहे थे कि रामानुजन ने खड़े होकर सवाल किया-सर! यदि किसी भी बालक को कोई केला न बांटा जाए, तो क्या तब भी प्रत्येक बालक को एक केला मिलेगा? यह सुनते ही सारे के सारे विद्यार्थी हो-हो करके हंस पड़े।
उनमें से एक ने कहा-यह क्या मूर्खतापूर्ण सवाल है। इस बात पर अध्यापक ने मेज थपथपाई और बोले-इसमें हंसने की कोई बात नहीं है। मैं आपको बताऊंगा कि यह बालक क्या पूछना चाहता है। बच्चे शांत हो गए। वे कभी आश्चर्य से शिक्षक को देखते तो कभी रामानुजन को। अध्यापक ने कहा - यह बालक यह जानना चाहता है कि यदि शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए, तो परिणाम क्या एक होगा?
आगे समझाते हुए अध्यापक ने बताया कि इसका उत्तर शून्य ही होगा। उन्होंने यह भी बताया कि यह गणित का एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल था तथा अनेक गणितज्ञों का विचार था कि शून्य को शून्य से विभाजित करने पर उत्तर शून्य होगा, जबकि अन्य कई लोगों का विचार था कि उत्तर एक होगा। अंत में इस समस्या का निराकरण भारतीय वैज्ञानिक भास्कर ने किया। उन्होंने सिद्ध किया कि शून्य को शून्य से विभाजित करने पर परिणाम शून्य ही होगा न कि एक।


VMW Team - M K Pandey - Blogger - Motivational Though



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24 May, 2017

ज्ञान की बाते


English Medium School

अभिभावक चाहे महल का हो या स्लम काहर एक की पहली पसंद इंग्लिश मीडियम स्कूल हो गयी है। परिणाम आज गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल रहे है। पर सवाल यह पैदा होता है कि इस इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था में बच्चे कुछ सीख भी पाते है ? साथियों ! शिक्षा का अर्थ मनुष्य की चेतना को जागृत कर ज्ञान को व्यवहारिक बनाना है। वही हमारे बच्चे बीना व्यवहारिक अर्थ समझें रटते चले जाते है। वे रट-रट कर केजी से पीजी तक पास कर जाते है। पर मौलिक ज्ञान सृजन नहीं कर पाते। हमारे बच्चों ने ‘रटनेको ही ‘ज्ञान’ समझ लिया है और ‘अंग्रेजी बोलने की योग्यता को (इंग्लिश स्पीकिंग)’ को ही ‘शिक्षा’ । विद्यार्थी वर्ग आज सिर्फ उतना पढ़ता है जितना की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए काफी है। डिग्री ही ज्ञान है इसका परिणाम यह निकला है कि डिग्री प्राप्त करों-  चाहे रटोंनकल करों या खरीद लो। हमारे बच्चे स्कूल में रटे ज्ञान का स्कूल के बाहर के बाहर की दूनियां के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते . 

एम के पाण्डेय निल्को

राष्ट्रीय आर्म रेस्लिंग प्रतियोगिता में राजस्थान के बाहुबलियों ने जीते पदक

शहर के दो बाहुबलियों का दिल्ली में आयोजित 41वीं राष्ट्रीय आर्म रेस्लिंग प्रतियोगिता में पदक जीतकर लौटने पर स्वागत किया गया। प्रतियोगिता में सागर शर्मा ने 70 किलो में रजत पदक ला कर शहर व राज्य का नाम रोशन किया वही 90 किलो में धर्मेंद्र शर्मा ने कांस्य पदक प्राप्त कर जिले और राज्य का गौरव बढ़ाया। । इस उपलब्धि पर कोच मधुलेश पाण्डेय , जय सूद राजस्थान पंजा कुश्ती संघ के अध्यक्ष श्री आर सी सूद व सचिव श्री कृपाल सिंह ने बधाई दी तथा इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की ।


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MRI Scan करावने से पहले सावधानी । चेतावनी
निम्नलिखित चीज़ो को एमआरआई स्कैन शुरू करने से पहले हटाया जाना जरूरी है
  • पर्स, बटुआ, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या चिप्स के साथ किसी भी अन्य कार्ड
  • मोबाइल फोन या कोई भी अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों
  • आभूषण या घड़ी, पिन इत्यादि
  • सिक्के, चाभी या अन्य धातु आइटम
कुछ अन्य वस्तुएं जो रोगी के शरीर के अंदर हैं, एमआरआई स्कैनिंग में समस्या पैदा कर सकती हैं इसलिए पहले स्टाफ को सूचित करे ।
  1. शरीर में कही धातु की रॉड या प्लेट
  2. कृत्रिम अंग
  3. पेसमेकर, स्टंट
कुछ आवश्यक बाते :
  • अगर आपको बंद जगह से तनाव या घबराहट होती है तो पहले बताये।
  • अगर आप गर्भवती है तो डॉक्टर, स्टाफ को सूचित करे ।
  • आप अपनी बीमारी के बारे मे स्पष्ट रूप से और खुल कर बताए सारी बाते गोपनीय रखी जाएगी ।
एक एमआरआई करने के लिए 25 मिनट या अधिक का समय लग सकता है ।

23 May, 2017

लड़का BY : TRIPURENDRA OJHA

लड़का:
हमारे इस पुरुषप्रधान समाज में लड़का पैदा होना अच्छा माना जाता है लेकिन उस लड़के को ये बात साबित करने में जो दुश्वारियां , जो त्याग , जो संघर्ष करना पड़ता है ये समाज को नहीं दिखता।
एक लड़का लाड़,प्यार,दुलार,फटकार,लात,जूतों ,मार आदि का झंझवात झेल कर जैसे तैसे बड़ा होता है..माँ बाप शुरू से ही अपनी उम्मीदों का बड़ा सा बोझ डाल देते है, डॉक्टर ,इंजीनियर साइंटिस्ट पता न क्या क्या..
+2 तक जाते जाते लड़का indication दे देता है कि मां बाप का investment कैसा return देने वाला है.
+2 के बाद क्या करना है ये guide करने वाले कम पूछने वाले ज्यादा होते हैं, कुछ प्रतिभाएं यहाँ से ITI और POLYTECHNIC कर के certified मजदूर बन जातीं हैं,तो कुछ IIT,PMT की PREPARATION की अग्निपरीक्षा को खड़ीं होतीं हैं। तो किसी का शुरू होता है वो दौर जब graduation pursuing कॉलेज से आकर बिना खाये पिए किसी बुकस्टाल पर vacancy देख रहा होता है, फॉर्म खरीदना ,भरना और पढाई के साथ साथ तैयारी नौकरी की...कहीं भी जाओ सबसे ज्यादा दिमाग झंड करने वाला सवाल लोग पूछते हैं क्या कर रहे हो आज कल?
कुछ नहीं graduation चल रहा है..(मन में चल क्या रहा घिसट रहा है.)..
जवाब दे दे कर 'लड़का' झंड हो रहा होता है कि %कितना है का दूसरा गोला धम्म।
Graduation के तीन साल में लड़के से लगभग 1095×10 बार हित-रिश्तेदार पूछ ही लेते कि बेटा क्या कर रहे हो?
कुछ लोग तो कसम से इतने खडूस होते हैं कि खुद की जिंदगी में भले कुछ न कर पाएं हो लेकिन मिलते ही अपने बड़े होने का अहसास दिलाते रहते हैं..
लड़के का सबसे मुश्किल दौर जब graduation complete हो जाता है और अब उसे किसी के सहारे की जरूरत है ..मार्गदर्शन की। बजाय उसके उसपे लोग और हमलावर हो जाते हैं। अब आगे की कहानी उसकी है जो ये झेल कर आगे बढ़ रहे हैं अधिकतर तो यहीं give up कर जातें है और एक विशेष ठप्पे के साथ जिंदगी काटने लगते हैं ।
लड़का असुरक्षा की भावना के साथ,समाज से अलग..रिश्तों से अलग तमाम परीक्षाओं की तैयारी करता हैं अब उसके माँ बाप भी उसका सपोर्ट छोड़ने लगते हैं ..थोड़े थोड़े पैसे के लिए कीच कीच..बात बात पर खुद का खर्च निकालने की नसीहत ..यहाँ लड़का कुछ भी करने को ठानता है ..कुछ भी।
छोटे लेवल की नौकरी, प्राइवेट नौकरी, अपने सारे सपनों को दरकिनार कर...अपने अरमानों को कुचल कर ,अपनी प्रतिभाओं के साथ समझौता करने को तैयार..
'माँ 10हजार की नौकरी है'
'तो क्या बेटा 5000 भी खर्च करोगे तो 5000 बचेंगे ही न'
साथ साथ तैयारी भी करते रहना अच्छी नौकरी का तब तक ये करो..
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अब तक आपने पढ़ा कि एक लड़का अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में कैसा कैसा अनुभव लेता है रोजगार पाने के पहले..अब आगे
इस बेरोजगारी से जूझती दुनिया में जब एक लड़का घर की माली हालत को परख, अपने अरमानों की बलि चढ़ा के परिस्थितियों से समझौता कर बैठता है और घर छोड़ देता है चंद रुपयों के लिए, जिससे वो खुद भी संतुष्ट नहीं ये जानकर भी कि मेरी योग्यता कहीं इससे ज्यादा है ,मैं इससे भी अच्छा कर सकता हूँ लेकिन इतना परिस्थितियां इतना मोहलत कहाँ देती हैं ,आख़िरकार लड़के को नौकरी मिल जाती है।बैंक क्लर्क,शिक्षक,रेलवे,सेना,प्राइवेट नौकरियां तमाम तरह की सुरसायें गरीब विलक्षण प्रतिभाओं को निगल जाती है ...इस बात की अनुभूति तब होती है जब वो लड़का खुद से कमजोर लेकिन आर्थिक रूप से मजबूत सहपाठी को तरह तरह के ऊंचाइयों को छूते देखता है ..ये नौकरियां पैसे और बेहतर जिंदगी तो देती हैं लेकिन जब बेमन की नौकरी हो तो वो सुकून नही दे पातीं खैर बंदा ये सोच के सन्तोष कर लेता है कि कुछ को तो ये भी नसीब नहीं।
नौकरी पाने के बाद कुछ लोग पूछते हैं सैलरी बढ़ी? कुछ पूछते हैं शादी कब कर रहे हो? कुछ पूछते हैं प्रमोशन कब होगा? लेकिन कोई ये नही पूछता खुश हो कि नहीं?
घर छोड़ देता है लड़का , नौकरी लग गई है अब जा रहा है अपने कर्मभूमि के तरफ .आज पहले से कुछ ज्यादा अनुभवी लग रहा है,आज कहीं बचपना नहीं झलक रहा।
चेहरे पर अजीब सी गंभीरता लिए हुए,दिमाग में तरह तरह के मूक प्रश्न और प्रत्युत्तरों का दौर चल रहा है
बैग पैक हो गया है दैनिक जरूरतों का सामान भर दिया गया है साथ में घर वालों का प्यार भी..अब यह वो समय है जब वो छोड़ जायेगा,अपनी प्यारी साइकिल जिसे कोई और छूता तक न था, अपना क्रिकेट बैट,अपनी पुरानी जीन्स, कुछ बॉल्स जो बक्से में थीं, वो ज्योमेट्री बॉक्स जिसमें रखे थे कुछ दुर्लभ चीजें,अपनी किताबें,अपने नोट्स...अपना बचपना..अपनी जिंदगी..।
मां की आँखे भर आईं है जो चिल्लाती थी देर तक सोने पर,बहन को पीटने पर ..उसके पिता जी आये हैं स्टेशन तक छोड़ने ..ट्रैन ने जैसे ही स्टेशन छोड़ा सीने में अजीब सा हो जाता है भींग जाती है बेडशीट की कुछ किनारियां जो ऊपरी बर्थ पर बिछा के लड़का सोने का अभिनय कर रहा है..सारी बातें याद आ रही है..तमाम विचारों के मकड़जाल में उलझा हुआ चला जाता है अपने घर से दूर अपने परिवार से दूर..
नौकरी में आने के बाद भी चुनौतियां कम नहीं हुई है..
तमाम असुविधाओं से लड़ना है जिसमे बाहर का खाना मुख्य है। खुद के सेहत पर कोई ध्यान कैसे दे ये तो आता ही नहीं ,कभी दिया ही नहीं..माँ रात को उठा के दूध जबरदस्ती पिलाती थी तो गुस्सा आता था लगता था ये तो बस खाना का एक हिस्सा है..वैसे ही लापरवाही होती है और लड़का बीमार हो जाता है..तब समझ में आता है खुद का खयाल कैसे रखना है...कैंटीन होटल का खाना खा खा के ऊबने के बाद..खुद बनाता है और खाता है ..घर में तरह तरह के नखरे दिखाने वाला ..आज बासी, आधी जली आधी कच्ची रोटियों को देख के हँसता हुआ लड़का भी जनाब बहुत संघर्ष करता है।

-त्रिपुरेंद्र ओझा 'निशान'


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11 May, 2017

State Arm Wrestling Championship

"This summer get heat in your hands and go for victory "

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