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18 August, 2017

तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा

स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में सुभाष चंद्र बोस  का नाम भी आता है, नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था. जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी.
“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था, उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहुत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी.

11 August, 2017

कौन है यह चोटीकटवा ? जानें पूरा सच...!

बीते कई दिनों से चर्चाओं में आए चोटी कटवा को लेकर हर कोई सच्चाई जानना चाहता है । हर कोई जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा?  इसको लेकर बड़े-बड़े टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और वेब मीडिया में भी सुर्खियां बनी हुई है । तो वही सरकार से लेकर पुलिस प्रशासन भी चोटी कटवा को लेकर हैरान है, और जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा? सर्च करने पर पता चला कि राजस्थान से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली, गुडगांव, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित अलग-अलग जगहों से भी आ रही हैं, समझ आया कि मसला मास हिस्टीरियाका है ।
राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली हरियाणा चंडीगढ़ पंजाब होते होते देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जा पहुंची है। यहां के मथुरा, आगरा, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, देवरिया समेत कई शहर चोटी कटवा से दहशत जदां है । यहां के कई गांवों से चोटी कटवा नाम की अफवाह से सनसनी मची हुई है । इससे सबसे ज्यादा दहशत में महिलाएं हैं, और अपनी चोटी बचाने को लेकर हैरान हैं। क्योंकि उसकी किसी ना किसी पड़ोसी गांव में या पड़ोसी की चोटी कट गई है , और अब वह भी दहशत में है। सच तो यह है कि 2017 में भी हम ऐसे हैं कि हमारे बीच मास हिस्टीरिया फैलाना बहुत आसान है।  आप सोचिए कि कौन सा भूत ऐसे लोगों की चोटी काटते फिरेगा?  कैमरे के सामने आने के लिए क्या लोग ये नहीं कर सकते?  या फिर बस डर के मारे?  मैं नहीं कह रहा कि ऐसा ही है, पर ऐसा भी हो सकता है। यूजीन इनस्को (फ्रेंच लेखक) की किताब राइनोसोर्स  की कहानी याद आ गई, ऐसा होता है कि एक आदमी शहर में राइनोसोर्स बन जाता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और धीरे-धीरे बाकी सब। ये चोटीकटवा की कहानी कुछ ऐसी ही लगती है. इसके कई तर्क हो सकते हैं,  पब्लिसिटी,  धार्मिक संवेदना फैलाना,  मास हिस्टीरिया फैलाना। कुछ भी हो सकता है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि हम जरा सोचे कि कहीं हम सब राइनोसोर्स तो नहीं बन रहे?
अपने आसपास के माहौल में अफवाहों की चपेट में आकर लोग एक्यूट साइकोसिस (मेनिया) की जद में आकर मास हिस्टीरिया का शिकार हो रहे हैं। इसमें कोई अंजान डर एक से दूसरे में पहुंचकर अफवाहों को बढ़ावा देता है। मास हिस्टीरिया की उन जगहों पर होने की आशंका ज्यादा रहती है जहां परिवार या समाज में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें पीड़ित को देखकर परिवार या अन्य आसपास के सदस्य खुद को उसी में ढालने की कोशिश करते हैं।  मास हिस्टीरिया एक सामान्य समस्या है। इसमें यदि एक बच्चा शिकायत करता है कि उसे पेट दर्द हो रहा है तो अन्य बच्चों को भी लगता है कि उनके साथ भी वैसा ही हो रहा है। जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। हिस्टीरिया (Hysteria) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। बहुधा ऐसा कहा जाता है, हिस्टीरिया अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है। अवचेतन अंतर्द्वंद्र से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक, शरीरक्रिया संबंधी एवं मनोवैज्ञानिक लक्षणों में परिवर्तित हो जाती है। 
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एम के पाण्डेय निल्को
शोध छात्र 

07 August, 2017

वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें।

प्रकृति की एक ताक़त होती है, आपने भी अनुभव किया होगा कि बहुत थक करके आए हो और एक गिलास भर पानी अगर मुहँ पर छिड़क दें, तो कैसी freshness आ जाती है। बहुत थक करके आए हो, कमरे की खिड़कियाँ खोल दें, दरवाज़ा खोल दें, ताज़ा हवा की सांस ले लें – एक नयी चेतना आती है। जिन पंच महाभूतों से शरीर बना हुआ है, जब उन पंच महाभूतों से संपर्क आता है, तो अपने आप हमारे शरीर में एक नयी चेतना प्रकट होती है, एक नयी ऊर्जा प्रकट होती है। ये हम सबने अनुभव किया है, लेकिन हम उसको register नहीं करते हैं, हम उसको एक धागे में, एक सूत्र में जोड़ते नहीं हैं। इसके बाद आप ज़रूर देखना कि आपको जब-जब प्राकृतिक अवस्था से संपर्क आता होगा, आपके अन्दर एक नयी चेतना उभरती होगी और इसलिए 5 जून का प्रकृति के साथ जुड़ने का वैश्विक अभियान, हमारा स्वयं का भी अभियान बनना चाहिये। पर्यावरण की रक्षा हमारे पूर्वजों ने की, उसका कुछ लाभ हमें मिल रहा है। अगर हम रक्षा करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिलेगा। वेदों में पृथ्वी और पर्यावरण को शक्ति का मूल माना गया है। हमारे वेदों में इसका वर्णन मिलता है। और अथर्ववेद तो पूरी तरह, एक प्रकार से पर्यावरण का सबसे बड़ा दिशा-निर्देशक ग्रंथ है और हज़ारों साल पहले लिखा गया है। हमारे यहाँ कहा गया है – ‘माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः’। वेदों में कहा गया है कि हम में जो purity है वह हमारी पृथ्वी के कारण है। धरती हमारी माता है और हम उनके पुत्र हैं। अगर हम भगवान् बुद्ध को याद करें तो एक बात ज़रूर उजागर होती है कि महात्मा बुद्ध का जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और उनका महा-परिनिर्वाण, तीनों पेड़ के नीचे हुआ था। हमारे देश में भी अनेक ऐसे त्योहार, अनेक ऐसी पूजा-पद्धति, पढ़े-लिखे लोग हों, अनपढ़ हो, शहरी हो, ग्रामीण हो, आदिवासी समाज हो, प्रकृति की पूजा, प्रकृति के प्रति प्रेम एक सहज समाज जीवन का हिस्सा है लेकिन हमें उसे आधुनिक शब्दों में आधुनिक तर्कों के साथ संजोने की ज़रूरत है। सभी राज्यों में वर्षा आते ही वृक्षारोपण का एक बहुत बड़ा अभियान चलता है। करोड़ों की तादात में पौधे लगाये जाते हैं। स्कूल के बच्चों को भी जोड़ा जाता है, समाज-सेवी संगठन जुड़ते हैं, NGOs जुड़ते हैं, सरकार स्वयं initiative लेती है। हम भी इस बार इस वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें। जितने भी लोकप्रिय व्यक्ति हैं वह पेड लगाये ओर इस मुहिम को आगे बढ़ाने में सहायक बने। सरकार द्वारा लाखों पेड़ फाइलों में लगते है ज़मीन पर नही। और वही लाखों पेड़ों की फाइल के कागज बनाने के लिए एक पेड़ और काट दिया जाता है आज देश में एक और हरित क्रांति की आवश्यकता है जय हिंद।

01 August, 2017

इस बरसात के मौसम मे


आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।
v मधुलेश पाण्डेय 'निल्को'



08 July, 2017

गुरुपूर्णिमा 9 जुलाई - गुरु गूंगे गुरू बावरे गुरू के रहिये दास


एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए !
भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो !

जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो !

भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है !

यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! नारायण! बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !

नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ?

यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया !

मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस भगवान के पास गए और कहा हे भगवान! मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !

यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान! इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये !भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !
नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है !
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !

गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा "स्वयं गुरु" भी नहीं कर सकते !

एक प्रसंग है कि एक पंडीत ने धन्ने भगत को एक साधारण पत्थर देकर कहा  इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देगे ! उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए ! फिर गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है।

01 June, 2017

VMW Team - शून्य एक हक़ीकत -

शून्य एक हक़ीकत तो क़रीब क़रीब हर पढ़े लिखे व्यक्ति पर उजागर है कि अंकगणित की दुनिया के इस हीरो, जिसे अंग्रेजी में ज़ीरो कहा जाता है का जन्म भारत में हुआ था। शून्य दरअसल क्या है? शून्य के आकार पर गौर करें। गोलाकार मण्डल की आकृति यूँ ही नहीं है। उसके खोखलेपन, पोलेपन पर गौर करें। एक सरल रेखा के दोनों छोर एक निर्दिष्ट बिन्दु की ओर बढ़ाते जाइए और फिर उन्हें मिला दीजिए। यह बन गया शून्य। यह शून्य बना है संस्कृत की ‘शू’ धातु से जिसमें फूलने, फैलने, बढ़ने, चढ़ने, बढ़ोतरी, वृद्धि, उठान, उमड़न और स्फीति का भाव है। स्पष्ट है कि शू से बने शून्य में बाद में चाहे निर्वात, सूनापन, अर्थहीन, खोखला जैसे भाव उसकी आकृति की वजह से समाविष्ट हुए हों, मगर दाशमिक प्रणाली को जन्म देने वालों की निगाह में शून्य में दरअसल फूलने-फैलने, समृद्धि का आशय ही प्रमुख था। इसीलिए यह शून्य जिस भी अंक के साथ जुड़ जाता है, उसकी क्षमता को दस गुना बढ़ा देता है, अर्थात अपने गुण के अनुसार उसे फुला देता है। जब इसके आगे से अंक या इकाई गायब हो जाती है, तब यह सचमुच खोखलापन, निर्वात, शून्यता का बोध कराता है। शून्य के आकार में भी यही सारी विशेषताएँ समाहित हैं। गोलाकार, वलयाकार जिसमें लगातार विस्तार का, फैलने का, वृद्धि का बोध होता है। दरअसल शून्य ही समृद्धि और विस्तार का प्रतीक है।


https://youtu.be/D9NUxnrj-Es


यह महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के बचपन की घटना है। एक बार गणित की कक्षा में अध्यापक ने ब्लैकबोर्ड पर तीन केले बनाए और पूछा- यदि हमारे पास तीन केले हों और तीन विद्यार्थी, तो प्रत्येक विद्यार्थी के हिस्से में कितने केले आएंगे? एक बालक ने तपाक से जवाब दिया- प्रत्येक विद्यार्थी को एक-एक केला मिलेगा। अध्यापक ने कहा-बिल्कुल ठीक। अभी भाग देने की क्रिया को अध्यापक आगे समझाने ही जा रहे थे कि रामानुजन ने खड़े होकर सवाल किया-सर! यदि किसी भी बालक को कोई केला न बांटा जाए, तो क्या तब भी प्रत्येक बालक को एक केला मिलेगा? यह सुनते ही सारे के सारे विद्यार्थी हो-हो करके हंस पड़े।
उनमें से एक ने कहा-यह क्या मूर्खतापूर्ण सवाल है। इस बात पर अध्यापक ने मेज थपथपाई और बोले-इसमें हंसने की कोई बात नहीं है। मैं आपको बताऊंगा कि यह बालक क्या पूछना चाहता है। बच्चे शांत हो गए। वे कभी आश्चर्य से शिक्षक को देखते तो कभी रामानुजन को। अध्यापक ने कहा - यह बालक यह जानना चाहता है कि यदि शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए, तो परिणाम क्या एक होगा?
आगे समझाते हुए अध्यापक ने बताया कि इसका उत्तर शून्य ही होगा। उन्होंने यह भी बताया कि यह गणित का एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल था तथा अनेक गणितज्ञों का विचार था कि शून्य को शून्य से विभाजित करने पर उत्तर शून्य होगा, जबकि अन्य कई लोगों का विचार था कि उत्तर एक होगा। अंत में इस समस्या का निराकरण भारतीय वैज्ञानिक भास्कर ने किया। उन्होंने सिद्ध किया कि शून्य को शून्य से विभाजित करने पर परिणाम शून्य ही होगा न कि एक।


VMW Team - M K Pandey - Blogger - Motivational Though



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24 May, 2017

ज्ञान की बाते


English Medium School

अभिभावक चाहे महल का हो या स्लम काहर एक की पहली पसंद इंग्लिश मीडियम स्कूल हो गयी है। परिणाम आज गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल रहे है। पर सवाल यह पैदा होता है कि इस इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था में बच्चे कुछ सीख भी पाते है ? साथियों ! शिक्षा का अर्थ मनुष्य की चेतना को जागृत कर ज्ञान को व्यवहारिक बनाना है। वही हमारे बच्चे बीना व्यवहारिक अर्थ समझें रटते चले जाते है। वे रट-रट कर केजी से पीजी तक पास कर जाते है। पर मौलिक ज्ञान सृजन नहीं कर पाते। हमारे बच्चों ने ‘रटनेको ही ‘ज्ञान’ समझ लिया है और ‘अंग्रेजी बोलने की योग्यता को (इंग्लिश स्पीकिंग)’ को ही ‘शिक्षा’ । विद्यार्थी वर्ग आज सिर्फ उतना पढ़ता है जितना की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए काफी है। डिग्री ही ज्ञान है इसका परिणाम यह निकला है कि डिग्री प्राप्त करों-  चाहे रटोंनकल करों या खरीद लो। हमारे बच्चे स्कूल में रटे ज्ञान का स्कूल के बाहर के बाहर की दूनियां के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते . 

एम के पाण्डेय निल्को

राष्ट्रीय आर्म रेस्लिंग प्रतियोगिता में राजस्थान के बाहुबलियों ने जीते पदक

शहर के दो बाहुबलियों का दिल्ली में आयोजित 41वीं राष्ट्रीय आर्म रेस्लिंग प्रतियोगिता में पदक जीतकर लौटने पर स्वागत किया गया। प्रतियोगिता में सागर शर्मा ने 70 किलो में रजत पदक ला कर शहर व राज्य का नाम रोशन किया वही 90 किलो में धर्मेंद्र शर्मा ने कांस्य पदक प्राप्त कर जिले और राज्य का गौरव बढ़ाया। । इस उपलब्धि पर कोच मधुलेश पाण्डेय , जय सूद राजस्थान पंजा कुश्ती संघ के अध्यक्ष श्री आर सी सूद व सचिव श्री कृपाल सिंह ने बधाई दी तथा इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की ।


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MRI Brain/Lumber/Dorsal/Cervical Spine or Orbit or Sella

MRI Scan करावने से पहले सावधानी । चेतावनी
निम्नलिखित चीज़ो को एमआरआई स्कैन शुरू करने से पहले हटाया जाना जरूरी है
  • पर्स, बटुआ, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या चिप्स के साथ किसी भी अन्य कार्ड
  • मोबाइल फोन या कोई भी अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों
  • आभूषण या घड़ी, पिन इत्यादि
  • सिक्के, चाभी या अन्य धातु आइटम
कुछ अन्य वस्तुएं जो रोगी के शरीर के अंदर हैं, एमआरआई स्कैनिंग में समस्या पैदा कर सकती हैं इसलिए पहले स्टाफ को सूचित करे ।
  1. शरीर में कही धातु की रॉड या प्लेट
  2. कृत्रिम अंग
  3. पेसमेकर, स्टंट
कुछ आवश्यक बाते :
  • अगर आपको बंद जगह से तनाव या घबराहट होती है तो पहले बताये।
  • अगर आप गर्भवती है तो डॉक्टर, स्टाफ को सूचित करे ।
  • आप अपनी बीमारी के बारे मे स्पष्ट रूप से और खुल कर बताए सारी बाते गोपनीय रखी जाएगी ।
एक एमआरआई करने के लिए 25 मिनट या अधिक का समय लग सकता है ।

23 May, 2017

लड़का BY : TRIPURENDRA OJHA

लड़का:
हमारे इस पुरुषप्रधान समाज में लड़का पैदा होना अच्छा माना जाता है लेकिन उस लड़के को ये बात साबित करने में जो दुश्वारियां , जो त्याग , जो संघर्ष करना पड़ता है ये समाज को नहीं दिखता।
एक लड़का लाड़,प्यार,दुलार,फटकार,लात,जूतों ,मार आदि का झंझवात झेल कर जैसे तैसे बड़ा होता है..माँ बाप शुरू से ही अपनी उम्मीदों का बड़ा सा बोझ डाल देते है, डॉक्टर ,इंजीनियर साइंटिस्ट पता न क्या क्या..
+2 तक जाते जाते लड़का indication दे देता है कि मां बाप का investment कैसा return देने वाला है.
+2 के बाद क्या करना है ये guide करने वाले कम पूछने वाले ज्यादा होते हैं, कुछ प्रतिभाएं यहाँ से ITI और POLYTECHNIC कर के certified मजदूर बन जातीं हैं,तो कुछ IIT,PMT की PREPARATION की अग्निपरीक्षा को खड़ीं होतीं हैं। तो किसी का शुरू होता है वो दौर जब graduation pursuing कॉलेज से आकर बिना खाये पिए किसी बुकस्टाल पर vacancy देख रहा होता है, फॉर्म खरीदना ,भरना और पढाई के साथ साथ तैयारी नौकरी की...कहीं भी जाओ सबसे ज्यादा दिमाग झंड करने वाला सवाल लोग पूछते हैं क्या कर रहे हो आज कल?
कुछ नहीं graduation चल रहा है..(मन में चल क्या रहा घिसट रहा है.)..
जवाब दे दे कर 'लड़का' झंड हो रहा होता है कि %कितना है का दूसरा गोला धम्म।
Graduation के तीन साल में लड़के से लगभग 1095×10 बार हित-रिश्तेदार पूछ ही लेते कि बेटा क्या कर रहे हो?
कुछ लोग तो कसम से इतने खडूस होते हैं कि खुद की जिंदगी में भले कुछ न कर पाएं हो लेकिन मिलते ही अपने बड़े होने का अहसास दिलाते रहते हैं..
लड़के का सबसे मुश्किल दौर जब graduation complete हो जाता है और अब उसे किसी के सहारे की जरूरत है ..मार्गदर्शन की। बजाय उसके उसपे लोग और हमलावर हो जाते हैं। अब आगे की कहानी उसकी है जो ये झेल कर आगे बढ़ रहे हैं अधिकतर तो यहीं give up कर जातें है और एक विशेष ठप्पे के साथ जिंदगी काटने लगते हैं ।
लड़का असुरक्षा की भावना के साथ,समाज से अलग..रिश्तों से अलग तमाम परीक्षाओं की तैयारी करता हैं अब उसके माँ बाप भी उसका सपोर्ट छोड़ने लगते हैं ..थोड़े थोड़े पैसे के लिए कीच कीच..बात बात पर खुद का खर्च निकालने की नसीहत ..यहाँ लड़का कुछ भी करने को ठानता है ..कुछ भी।
छोटे लेवल की नौकरी, प्राइवेट नौकरी, अपने सारे सपनों को दरकिनार कर...अपने अरमानों को कुचल कर ,अपनी प्रतिभाओं के साथ समझौता करने को तैयार..
'माँ 10हजार की नौकरी है'
'तो क्या बेटा 5000 भी खर्च करोगे तो 5000 बचेंगे ही न'
साथ साथ तैयारी भी करते रहना अच्छी नौकरी का तब तक ये करो..
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अब तक आपने पढ़ा कि एक लड़का अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में कैसा कैसा अनुभव लेता है रोजगार पाने के पहले..अब आगे
इस बेरोजगारी से जूझती दुनिया में जब एक लड़का घर की माली हालत को परख, अपने अरमानों की बलि चढ़ा के परिस्थितियों से समझौता कर बैठता है और घर छोड़ देता है चंद रुपयों के लिए, जिससे वो खुद भी संतुष्ट नहीं ये जानकर भी कि मेरी योग्यता कहीं इससे ज्यादा है ,मैं इससे भी अच्छा कर सकता हूँ लेकिन इतना परिस्थितियां इतना मोहलत कहाँ देती हैं ,आख़िरकार लड़के को नौकरी मिल जाती है।बैंक क्लर्क,शिक्षक,रेलवे,सेना,प्राइवेट नौकरियां तमाम तरह की सुरसायें गरीब विलक्षण प्रतिभाओं को निगल जाती है ...इस बात की अनुभूति तब होती है जब वो लड़का खुद से कमजोर लेकिन आर्थिक रूप से मजबूत सहपाठी को तरह तरह के ऊंचाइयों को छूते देखता है ..ये नौकरियां पैसे और बेहतर जिंदगी तो देती हैं लेकिन जब बेमन की नौकरी हो तो वो सुकून नही दे पातीं खैर बंदा ये सोच के सन्तोष कर लेता है कि कुछ को तो ये भी नसीब नहीं।
नौकरी पाने के बाद कुछ लोग पूछते हैं सैलरी बढ़ी? कुछ पूछते हैं शादी कब कर रहे हो? कुछ पूछते हैं प्रमोशन कब होगा? लेकिन कोई ये नही पूछता खुश हो कि नहीं?
घर छोड़ देता है लड़का , नौकरी लग गई है अब जा रहा है अपने कर्मभूमि के तरफ .आज पहले से कुछ ज्यादा अनुभवी लग रहा है,आज कहीं बचपना नहीं झलक रहा।
चेहरे पर अजीब सी गंभीरता लिए हुए,दिमाग में तरह तरह के मूक प्रश्न और प्रत्युत्तरों का दौर चल रहा है
बैग पैक हो गया है दैनिक जरूरतों का सामान भर दिया गया है साथ में घर वालों का प्यार भी..अब यह वो समय है जब वो छोड़ जायेगा,अपनी प्यारी साइकिल जिसे कोई और छूता तक न था, अपना क्रिकेट बैट,अपनी पुरानी जीन्स, कुछ बॉल्स जो बक्से में थीं, वो ज्योमेट्री बॉक्स जिसमें रखे थे कुछ दुर्लभ चीजें,अपनी किताबें,अपने नोट्स...अपना बचपना..अपनी जिंदगी..।
मां की आँखे भर आईं है जो चिल्लाती थी देर तक सोने पर,बहन को पीटने पर ..उसके पिता जी आये हैं स्टेशन तक छोड़ने ..ट्रैन ने जैसे ही स्टेशन छोड़ा सीने में अजीब सा हो जाता है भींग जाती है बेडशीट की कुछ किनारियां जो ऊपरी बर्थ पर बिछा के लड़का सोने का अभिनय कर रहा है..सारी बातें याद आ रही है..तमाम विचारों के मकड़जाल में उलझा हुआ चला जाता है अपने घर से दूर अपने परिवार से दूर..
नौकरी में आने के बाद भी चुनौतियां कम नहीं हुई है..
तमाम असुविधाओं से लड़ना है जिसमे बाहर का खाना मुख्य है। खुद के सेहत पर कोई ध्यान कैसे दे ये तो आता ही नहीं ,कभी दिया ही नहीं..माँ रात को उठा के दूध जबरदस्ती पिलाती थी तो गुस्सा आता था लगता था ये तो बस खाना का एक हिस्सा है..वैसे ही लापरवाही होती है और लड़का बीमार हो जाता है..तब समझ में आता है खुद का खयाल कैसे रखना है...कैंटीन होटल का खाना खा खा के ऊबने के बाद..खुद बनाता है और खाता है ..घर में तरह तरह के नखरे दिखाने वाला ..आज बासी, आधी जली आधी कच्ची रोटियों को देख के हँसता हुआ लड़का भी जनाब बहुत संघर्ष करता है।

-त्रिपुरेंद्र ओझा 'निशान'


(ये मेरे अपने निजी विचार हैं ये लेख किसी बात को सही और किसी बात को गलत नहीं ठहराता है)
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11 May, 2017

State Arm Wrestling Championship

"This summer get heat in your hands and go for victory "

07 May, 2017

MRI Scan in Jaipur

Vardhman Diagnostic Centre Jaipur’s top Diagnostic centre has core focus on quality and reliable diagnostic of the samples that we receive.
Started more then two decade ago Vardhman labs has gained the faith of patients and doctors by its reliable team and latest machines that provide foolproof and dependable report of tests.
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05 May, 2017

रुद्रपुर - भगवान रुद्र की दूसरी काशी - एम के पाण्डेय ‘निल्को’

भारत में वैसे तो अनेकानेक मंदिर शिवालय हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में 11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। यहां शिवलिंग जमीन से अपने आप निकला था। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। देवरिया जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईट बौद्ध कालीन है। इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से भी पुकारती है । उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निम्न पंक्तियां उल्लिखित हैं- 

खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:,
 प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: 
पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है। इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा । महाशिवरात्रि के दिन एवं श्रावण मास में यहां भारी भीड़ होती है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव, ॐ नम: शिवाय और बाबा भोलेनाथ की जयकारों से गुंजायमान रहता है। जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर बनने से पहले यहां घना जंगल था। बताते है कि उस समय दिन में गाय, भैंस चराने के लिए कुछ लोग आया करते थे। आज जहां शिवलिंग है, वहां नित्य प्रतिदिन एक गाय प्राय: आकर खड़ी हो जाती थी तथा उसके थन से अपने आप वहां दूध गिरना शुरू हो जाता था। इस बात की जानकारी धीरे-धीरे तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरी सिंह के कानों तक पहुंची तो उन्होंने वहां खुदाई करवाई। खुदाई में शिवलिंग निकला। राजा ने सोचा कि इस घने जंगल से शिवलिंग को निकाल कर अपने महल के आस-पास मंदिर बनवाकर इसकी स्थापना की जाए।  कहा जाता है कि जैसे-जैसे मजदूर शिवलिंग निकालने के लिए खुदाई करते जाते वैसे-वैसे जमीन में धंसता चला जाता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। शिवलिंग तो नहीं निकला वहां एक कुआं जरूर बन गया। सोमनाथ के अतिरिक्त सामान्य धरातल से नीचे का शिवलिंग भारत में संभवत: अन्यत्र कहीं नहीं है। बाद में राजा को भगवान शंकर ने स्वप्न में वहीं पर मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया। भगवान के आदेश के बाद राजा ने वहां धूमधाम से काशी के विद्धान पंडितों को बुलवाकर भगवान शंकर के इस लिंग की विधिवत स्थापना करवाई। जब तक वह जीवित रहे, भगवान दुग्धेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना और श्रावण मास में मेला आयोजित करवाते थे। मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। 
एम के पाण्डेय निल्को
 




25 April, 2017

सुकुमा नक्सली हमले मे 26 जवानों की शहादत पर आक्रोश जताती मेरी रचना – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

(सुकुमा नक्सली हमले मे 26 सीआरपीएफ़ जवानों की शहादत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से आक्रोश जताती मेरी रचना – एम के पाण्डेय निल्को’)


बहुत सुन चुके जुमले
कहो कैसी लाचारी है ?
हर घटना पर निंदा मंत्री
अब कुछ करने की बारी है
खोल दो हाथ तो
नहीं मार पाएगा कोई पर परिंदा
आप करते रहे केंद्र मे रहकर
बस कठोर से कठोर निंदा
मोदी जी क्या आप बरता सकते है
आखिर 26 शेरो के हत्यारे
क्यो है अब तक ज़िंदा ?
आप कहते है हम सेना का
बड़ा सम्मान रखते है
पर विपदा की इस घड़ी में
हम अलग अरमान रखते है
सत्ता के आगे आप सभी
नशे मे चूर लगते है
पता नहीं किस बात पर
बड़े मजबूर लगते है
लड़ोगे क्या तुम पाकिस्तान और आतंकवाद से
मार दिया घर मे ही तुम्हारे इस नकस्लवाद ने
शहादत शहीदो की निल्को
सियासी खेल लगती है
सारी रक्षा नीतिया
मुझे फेल लगती है
रंगा है खून से आज
फिर अपने माटी को
साप सूंघ गया है क्या
56 इंच के छती को
एम के पाण्डेय निल्को



(कृपया रचनाकार का नाम न हटाए और मूल रूप से ही शेयर करे ।)




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