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02 September, 2017

....या फिर तुम्हारी यादें



तुम या फिर तुम्हारी यादें

जब जब आती है
एक सुखद एहसास मेरे मन को
छू कर भाग जाती है
भाग जाती है
क्योकि
वो रुक नही सकती
और मैं उसे
रोक नही सकता
उस क्षणिक समय में
खो जाते है
हम दोनों 
जी हाँ , सही सुन रहे है
हम दोनों
मैं और मेरी तन्हाइयां
क्योंकि यही तो साथ देती है
पहले से थी और 
बाद तक साथ रहेगी
यही तो है जो अपना है
जो साथ है
जो साथ रहेगा 
सुनाऊंगा किसी रोज
एक दूसरा किस्सा
जिसका तू ही होगा एक हिस्सा
मेरी खामोशियों को न तोड़ो
भादो का महीना है
वर्षा से कही आफत है तो
कही राहत है
क्या सुनाऊ
क्या लिखूं
सोच रहा हूँ यही छोड़ 
देता हूँ जो है
वो किस्मत के 
भरोसे
या करे संघर्ष 
मिलते है इस आधी अधूरी
बिना सिर पैर की
रचना के बाद
-
एम के पाण्डेय निल्को
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