22 जनवरी, 2019

क्या प्रेम में शारीरीक संबंध जरूरी होता है? 

प्रेम में शारीरिक संबंध जरुरी है…क्योंकि शरीर की यादाश्त होती हैं…जिस प्रकार एक नव्जन्मा शिशु भी अपनी अपनी मां का स्पर्श पहचानता हैं…चाहे आंखे बन्द हो पर वह मां की गोद अौर हाथो को पहचानता है..जबकि उसका मस्तिस्क इतना विकसित नहीं होता..ये शरीर की यादाश्त हैं…प्रेम में भी यही होता हैं…हम आन्खे बन्द करके स्पर्श करके अपने साथी को पहचान सकते हैं…. आज प्रेम की हालत यह है कि 25 साल का होने से पहले, आप 25 साथी बदल चुके होते हैं – इसकी कीमत लोग चुका रहे हैं – अमेरिका की 10 फीसदी जनसंख्या डिप्रेशन या अवसाद की दवाओं पर निर्भर है। उसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनमें स्थिरता की कमी होती है क्योंकि उनका शरीर भ्रमित होता है।

बहुत ज्यादा अंतरंगता की कीमत हर जगह चुकानी पड़ती है – जब तक कि आप यह नहीं जानते कि इस शरीर को खुद से एक दूरी पर कैसे रखें। जिसने यह दूरी बनानी सीख ली, वॊ दुनिया जीत लेता है… ऐसे इंसान का ऐसी चीजों की ओर कोई झुकाव नहीं होता। वह शरीर की सीमाओं और विवशताओं से मजबूर नहीं होता – वह अपने शरीर को एक साधन या उपकरण की तरह इस्तेमाल करता है। वरना, अंतरंगता को कम से कम तक रखना सबसे अच्छा होता है। इसलिए हमने कहा कि एक के लिए एक, जब तक कि उनमें से किसी एक की मृत्यु नहीं होती और दूसरा पुनर्विवाह नहीं कर सकता….

आपके शरीर की याददाश्त की तुलना में आपके दिमाग की याददाश्त बहुत कम है। अगर आप किसी चीज या किसी इंसान को एक बार छू लें, तो आपका दिमाग भूल सकता है मगर शरीर में वह हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। जब लोग एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो मन उसे भूल सकता है, मगर शरीर कभी नहीं भूलेगा। अगर आप तलाक लेते हैं, तो चाहे आप अपने साथी से कितनी भी नफरत करते हों, फिर भी आपको पीड़ा होगी क्योंकि शारीरिक याददाश्त कभी नहीं खो सकती

चाहे आप थोड़ी देर तक किसी का हाथ पर्याप्त अंतरंगता से पकड़ें, आपका शरीर कभी उसे नहीं भूल पाएगा

हथेलियां और आपके तलवे बहुत प्रभावशाली रिसेप्टर यानी ग्राहक हैं। जब भी आप किसी ऐसे इंसान को देखते हैं, जिसके साथ आप जुड़ना नहीं चाहते, तो सिर्फ ‘नमस्कार’ करें क्योंकि जब आप दोनों हाथों को साथ लाते हैं (या अपने पैर के दोनों अंगूठों को साथ लाते हैं), तो यह शरीर को याददाश्त ग्रहण करने से रोक देता है।

इसका मकसद शारीरिक याददाश्त को कम से कम रखना है, नहीं तो आपको अनुभव के एक भिन्न स्तर पर ले जाना मुश्किल हो जाएगा। जो लोग भोगविलास में अत्यधिक लीन होते हैं, उनके चेहरे पर एक खास मुस्कुराहट होती है, जिसमें एक धूर्तता भरी होती है, उसमें कोई खुशी नहीं होती। उससे छुटकारा पाने में बहुत मेहनत लगती है क्योंकि भौतिक याददाश्त आपको इस तरीके से उलझा देती है कि आपका दिमाग उसे समझ भी नहीं पाता। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप अपने शरीर को जिन चीजों के संपर्क में लाते हैं, उनके प्रति जागरूक होना सीखें।

- प्रज्ञा पाठक

06 जनवरी, 2019

Google Self Driving Bike/ Cycle

गूगल ने आधुनिकता और तकनीक नया दिशा फिर से प्रदान किया है । ड्राइवरलेस कारों के बाद अब सेल्फ ड्राइविंग ​साइकिल /बाइक भी अब बाजार में आ गई है। अब आपकी साइकिल खुद-ब-खुद रोड पर चलेगी। गूगल ने इन्हें वल्र्ड प्रीमियम साइकलिंग सिटी के मौके पर एम्सटर्डम की गलियों में टेस्ट भी किया गया है। ये साइकिलें पॉवरफुल इलेक्ट्रिक मोटर से लैस हैं। सथ ही इनमें पिकअप फंक्शन भी दिया गया है जो साइकिल को किसी भी पोजीशन से पिकअप कर सकती है। अपने रोमांच को कई गुना बढ़ाने के लिए नीचे दिए गए सेल्फ ड्राइविंग बाइक/साइकिल किल्स के इस वीडियो को देखें।



22 दिसंबर, 2018

हनुमान जी की जाति क्या है ?

हनुमान ब्राह्मण जाति से हैं - रामायण में कई स्थान पर उनके प्रगाढ़ पाण्डित्य पर प्रकाश डाला गया है । जब वे अशोक वाटिका पहुंचते हैं तो उनका वक्तव्य है - यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् । रावण मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ॥ अर्थात् यदि मैं संस्कृत भाषा का प्रयोग करता हूं तो सीता मां मुझे रावण समझकर भयभीत हो सकती हैं । ( संस्कृत प्रायः उच्च वर्गों की खास तौर पर ब्राह्मणों की भाषा थी)


हनुमान क्षत्रिय जाति से हैं - क्षत्रिय कौन होता है जो शौर्य प्रदर्शन करे । आपद्काल में शत्रुओं से रक्षा करे । हनुमान जब राक्षसों के विरूद्ध लड़ रहे हैं तो अपने क्षत्रियत्व गुण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । हनुमान चालीसा में उक्त है -महावीर विक्रम बजरंगी । आगे वहीं पर कथित है कि उनके हाथ में वज्र और ध्वजा विद्यमान है और वे जनेउ भी धारण किए हैं ( हाथ वज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेउ साजै)


हनुमान वैश्य जाति से हैं - अर्थ की दृष्टि से इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है जिसका मूल अर्थ "बसना" होता है। कर्म सिद्धांत वर्गीकरण मे पोषण के कार्यों से जुड़े गतिविधियों को वैश्य जाति के लोग अंजाम देते हैं । इस लिहाज से हनुमान सबसे बड़े वैश्य हैं क्योंकि वे स्वयं तो बसे ही लक्ष्मण को भी बसा दिया ।( संजीवनी लाकर उन्होंने लक्ष्मण को पुनर्जीवित किया था।)


हनुमान शूद्र जाति से हैं - गीता के १८वें अध्याय में कहा गया है कि परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यपि स्वभावजम् अर्थात् सेवा व सुश्रुषा करना शूद्र का कर्तव्य है । हनुमान से बड़ा भक्त खोज पाना नामुमकिन है । वे अनवरत अपने अराध्य प्रभु राम की सेवा में निरत रहते थे ।


गौरतलब है कि वर्ण का वर्गीकरण कर्म का वर्गीकरण है, न कि मनुष्य का वर्गीकरण। प्रत्येक मनुष्य कहीं न कहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्वयं है क्योंकि इन चारों के गुण उसमें समबेत हैं । पहले समय मनुष्य जाति का एक ही वर्ण था, चार वर्ण अथवा भिन्न-भिन्न जातियों की स्थापना बाद में हुई है

एक वर्ण मिदं पूर्वं विश्वमासीद् युधिष्ठिर।

कर्म क्रिया विभेदेन चातुर्वर्ण्यम् प्रतिष्ठितम्॥

न विशेषोऽस्ति वर्णानाम् सर्व ब्राह्ममिदं जगत्। ( महाभारत )

आज के परिप्रेक्ष्य में हमें यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वार्ता का प्रस्थान बिन्दु क्या है? क्या हनुमान को हम वर्ग विशेष के नाते पूजते हैं या उनके कर्म व गुणों के आधार पर । यदि वे नीच कुल के भी होते तो क्या हम उनके गुणों के आधार पर उन्हें समादृत नहीं करते ?

एम के पाण्डेय
रिसर्च स्कॉलर

30 नवंबर, 2018

हनुमान जी दलित और वंचित हैं

हनुमान जी को दलित कहने पर देश में सियासत शुरू हो गयी है। यूपी के सीएम योगी के बयान को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। योगी के हनुमान जी को दलित कहने पर लोगों ने अपनी -अपनी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है। हालांकि, सीएम योगी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर उनकी खूब आलोचना हो रही है. ट्विटर, फेसबुक पर कई तरह के मेम्स बनाए जा रहे हैं. बता दें कि इससे पहले शहरों के नामों को लेकर भी योगी आदित्यनाथ विवादों में रहे हैं. सोशल मीडिया में इस बयान के हवाले से लोगों ने भाजपा और आदित्यनाथ पर जबर्दस्ती की जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगाया है. फेसबुक पर पोस्ट एक है, ‘जिन्हें कृष्ण में यादव और हनुमान में दलित नजर आते हैं, वो हमें हिंदूवादी नहीं, जातिवादी नजर आते हैं.’ वैसे भी भारतीय चुनाव ऐतिहासिक और मिथकीय किरदारों जैसे मुगल, टीपू सुल्तान, नेहरू, गांधी, भगवान राम, हनुमान और विकास आदि के बारे में जानने का बहुत ही अच्छा मौका होते हैं.

11 अक्तूबर, 2018

गंगा मइया की रक्षा के लिए अनशन पर बैठा एक संत अमर हो गया |

लंबे समय से मां गंगा की स्वच्छता और रक्षा की मांग कर रहे पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल की गुरुवार को मौत हो गई। उन्‍हें स्वामी सानंद के नाम से जाना जाता था। स्वामी सानंद पिछले 112 दिनों से अनशन पर थे और उन्होंने 9 अक्टूबर को जल भी त्याग दिया था। उन्‍होंने ऋषिकेश में दोपहर एक बजे अंतिम सांस ली। वह 87 साल के थे। सानंद गंगा नदी की स्वच्छता को लेकर प्रयासरत थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिख चुके थे। 

जीडी अग्रवाल आईआईटी कानपुर में सिविल और पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण का काम किया। इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सचिव भी रहे।

गंगा समेत अन्य नदियों की सफाई को लेकर जीडी अग्रवाल ने पहली बार 2008 में हड़ताल की थी। मांगें पूरी कराने के लिए उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों को अपना जीवन समाप्त करने की धमकी भी दी। वे तब तक डटे रहे, जब तक सरकार नदी के प्रवाह पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण को रद्द करने पर सहमत न हुई।

जुलाई 2010 में तत्कालीन पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री जयराम रमेश ने व्यक्तिगत रूप से उनके साथ बातचीत में सरकार के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। साथ ही, गंगा की महत्वपूर्ण सहायक नदी भागीरथी में बांध नहीं बनाने पर सहमति भी जताई।

2014 में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा की स्वच्छता के लिए प्रतिबद्धता दिखाई थी। इसके बाद जीडी अग्रवाल ने आमरण अनशन खत्म कर दिया था। हालांकि, सरकार बनने के बाद से अब तक ‘नमामि गंगे’ परियोजना का सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। ऐसे में अग्रवाल ने 22 जून, 2018 को हरिद्वार के जगजीतपुर स्थित मातृसदन आश्रम में दोबारा अनशन शुरू कर दिया।

अग्रवाल 2012 में पहली बार आमरण अनशन पर बैठे थे। इस दौरान राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण को निराधार कहते हुए उन्होंने इसकी सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया। साथ ही, अन्य सदस्यों को भी यही करने के लिए प्रेरित किया। पर्यावरण के क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा को देखते हुए उनके हर उपवास को गंभीरता से लिया गया।

10 जुलाई, 2018 को पुलिस ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे जीडी अग्रवाल को जबरन उठा लिया और एक अज्ञात स्थान पर ले गए। अग्रवाल ने इसके खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 12 जुलाई, 2018 को उत्तराखंड के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि जीडी अग्रवाल से अगले 12 घंटे में बैठक करके उचित हल निकाला जाए। इसके बावजूद कुछ भी सार्थक परिणाम नहीं निकला।

सरकार ने वयोवृद्ध पर्यावरणविद को ऋषिकेष स्थित एम्स में हिरासत में ले लिया। यहां चिकित्सकों के जबरदस्ती करने पर भी उन्होंने भोजन नहीं किया। 9 अक्टूबर से जल भी त्याग दिया था। इस दौरान सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया, जिसे स्वामी सानंद ने अस्वीकार कर दिया था।