26 दिसंबर, 2010

पेश है कुछ अंश..



VMW Team ने अलग-अलग लोगो से आरक्षण के बारे में जानने की कोशिश की पेश है कुछ अंश...


A.K.Pandey
राजस्थान के ए. के. पाण्डेय  कहते है की   दिक्कत की बात यह है कि इतने वर्षों तक प्रयोग चलाने के बाद आरक्षण हमारे समाज में सामाजिक न्याय का पर्याय बन गया है. कई मायनों में उसका विकल्प बन गया है. यह दुखद स्थिति है.
यह तो उस तरह है कि कोई सर्जन एक ही कैंची से हर तरह की सर्जरी करे.यदि आरक्षण देना ही है तो सबसे आर्थिक स्थिति का आकलन करके आरक्षणं दीजिए, वो भी एक लिमिटेड समय तक।उसके बाद आरक्षण बन्द।लेकिन बदकिस्मती से अपने देश मे ऐसा होता नही है,वोट की क्षुद्र राजनीति की वजह से नेता आरक्षण हटाते नही।
 

N.D.Dehati

 गोरखपुर के एन.डी.देहाती  कहते है की सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण के विरोध का प्रभावित लोगों द्वारा लोगों विरोध किया जा रहा है। विरोध के कारणों में प्रतिभा की उपेक्षा, गुणवत्ता में गिरावट का डर तथा समाज को पिछड़ेपन के कुयें में ढकेल देने व विकास की गति में नकारात्मक प्रभाव आदि-इत्यादि बताये गये हैं।

यह सच है कि समाज में जब किसी भी वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है या किसी दूसरे वर्ग को ज्यादा सुविधायें मिलतीं हैं तो खलता है। बुरा लगता है। जाति पर आधारित आरक्षण से यह प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। जो जातियाँ प्रभावित होती हैं उनकी सहज प्रतिक्रिया होती है कि पुरखों के पापों का दंड हम क्यों भरें?यह कहां का न्याय है कि हमसे कम सक्षम व्यक्ति सिर्फ इस आधार पर ज्यादा पाये कि अनुसूचित जाति-जनजाति का है या फिर पिछड़ी जाति का है।



Niraj
हरखौली, देवरिया  के नीरज जी कहते है की अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं। यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ? बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें। अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।


Dr.H.M.Pandey  
हिमांचल प्रदेश के Dr.H.M.Pandey  कहते है की आरक्षण तो देश के सामने की तमाम समस्याओं में से एक है। एक तरह से भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,अशिक्षा,बेईमानी का बाईप्रोडक्ट है। जब तक ये समस्यायें रहेंगी इस तरह की समस्यायें बनीं रहेंगी। जब तक प्रयासों में ईमानदारी नहीं होगी किसी भी समस्या का हल जीरो बटा सन्नाटा ही होगा तथा नित नयी समस्यायें सामने  आती रहेंगी। हर समस्या के लिये नेताओं को दोष देने की हमारी प्रवृत्ति है।नेता तो हमारे समाज के प्रतिनिधि हैं। जैसे हम होंगे वैसे हमारे रहनुमा होंगे। नेता कहीं आसमान से तो नहीं आयेंगे।हमारे बीच से ही आयेंगे। बकौल मेराज फैजाबादी नेताओं का तो काम ही है-
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना ।
 


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धन्यवाद!
VMW Team (India's New Invention) 


10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढियां, तार्किक जुगलबंदी से बचते हुये अपने अहसासों को बेहद बखूबी व्यक्त किया है,.वाकई,आगे-आगे देखिये क्या होता है. शायद कुछ अच्छा ही हो…
    बहुत अच्छा पोस्ट बहुत बहुत बधाई !!

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  2. आरक्षण की व्यवस्था में कुछ बदलाव भी करने होंगे. जैसे एक पीढ़ी में जो लोग आरक्षण का लाभ उठा चुके हैं, उनकी दूसरी पीढ़ी को उस स्तर तक इस व्यवस्था का लाभ न मिले.

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  3. waht do u mean of-
    पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
    फिर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना

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  4. बहुत अच्छा पोस्ट बहुत बहुत बधाई !!
    Ved prakesh

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  5. भारत को आजादी मिले 6 दशक से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन आज भी सोच के मामले में हम आजाद नहीं है। आज भी विभिन्न कास्ट वालों को आरक्षण दिया -जाता है जिस से लगता है कि आज भी हमारी सोच पर किसी की सोच हावी हो रही है।
    बहुत अच्छा पोस्ट बधाई !!

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  6. ए. परियाकरुप्पन मामले में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने ही कहा था कि आरक्षण किसी के निहित स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए। शोषित कर्मचारी संघ मामले में भी न्यायालय ने कहा था कि आरक्षण नीति की सफलता की कसौटी यही होगी कि कितनी जल्दी आरक्षण की आवश्यकता को समाप्त किया जा सकता है। "सेवायोजन, शिक्षा, विधायी संस्थाओं में लागू आरक्षण नीति की हर पांच वर्ष में एक बार समीक्षा की जानी चाहिए।

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  7. नेता लोग भी आरक्षण हटा सकते है लेकिन उनको अपनी कुर्सी का ख्याल है जनता की नहीं
    बहुत अच्छा पोस्ट

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  8. यह सच है कि समाज में जब किसी भी वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है या किसी दूसरे वर्ग को ज्यादा सुविधायें मिलतीं हैं तो खलता है। बुरा लगता है। जाति पर आधारित आरक्षण से यह प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। जो जातियाँ प्रभावित होती हैं उनकी सहज प्रतिक्रिया होती है कि पुरखों के पापों का दंड हम क्यों भरें?यह कहां का न्याय है कि हमसे कम सक्षम व्यक्ति सिर्फ इस आधार पर ज्यादा पाये कि अनुसूचित जाति-जनजाति का है या फिर पिछड़ी जाति का है।

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  9. बहुत अच्छा पोस्ट बहुत बहुत बधाई !!

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  10. जब तक प्रयासों में ईमानदारी नहीं होगी किसी भी समस्या का हल जीरो बटा सन्नाटा ही होगा

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