22 दिसंबर, 2010

प्याज का तीखापन...

प्‍याज की आसमान पर पहुंची कीमत को थोड़ा नीचे लाने के लिए सरकार सक्रिय हो गई है। सरकार ने प्‍याज के आयात पर लगने वाले कस्‍टम ड्यूटी को पूरी तरह खत्‍म कर दिया है। इससे पहले सरकार ने प्‍याज की तेजी से बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए इसके निर्यात पर 15 जनवरी तक रोक लगा दी थी। केंद्रीय वित्‍त सचिव अशोक चावला ने आज यहां पत्रकारों से कहा, 'प्‍याज के आयात पर लगने वाले कस्‍टम ड्यूटी को 5 फीसदी से घटाकर शून्‍य कर दिया गया है।'
 देश के विभिन्न शहरों में प्याज के दाम अचानक कुछ दिन में ही बढ़कर 70 रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुँच गए हैं। आपूर्ति में कमी की वजह से संभवत: प्याज के दामों में तेजी आई है।  प्रधानमंत्री चाहते हैं कि प्याज की कीमतों में बेतहाशा तेजी पर अंकुश के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएँ, जिससे इसे उचित स्तर पर लाया जा सके। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि ये कदम तेजी से उठाए जाएँ और इनकी रोजाना के आधार पर निगरानी की जाए।
महंगाई सिर्फ आम जनता को हमेशा भारी नहीं पड़ती है। कई बार ये सरकारों की भी चूलें हिला देती है। प्याज के दामों ने सिर्फ आम आदमी के आंसू नहीं निकाले हैं, बल्कि इसने सरकारों को भी रोने पर मजबूर कर दिया है। 1980 की चरण सिंह की सरकार प्याज के आसमान छूते दामों की वजह से गई थी। जबकि 1999 में दिल्ली में बीजेपी की हार की वजह भी प्याज की बढ़ी कीमत ही बनी थी। इन दोनों मौकों पर कांग्रेस को फायदा हुआ था। 1980 में चरण सिंह की काम चलाऊ सरकार के खिलाफ इंदिरा गांधी ने कांग्रेस की ओर से प्याज के आसमान छूते दाम को मुद्दा बनाया था, जबकि 1998 में शीला दीक्षित ने बीजेपी के खिलाफ इसे  चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था।
मदन प्रसाद शुक्ला
बरहज