02 जून, 2011

जुनून ---- डाक्टर वि.वी. तिवारी का

VMW Team   के लिए  सलेमपुर (देवरिया) के जागरण के पत्रकार जितेंद्र उप्पाधाय की रिपोर्ट..
       डावी वी   तिवारी की जमात में यदि लोग शामिल हो जाएं तो प्लास्टिक युक्त सामग्री के जलने से निकलने वाले कार्बन मोनोआक्साइड इससे ओजोन की परत में छिद्र होने की चिंता से विश्व समुदाय बच सकता है। पालीथिन के विरुद्ध पिछले 13 वर्षो से डा. व्यास तिवारी की जंग चल रही है। तहसील मुख्यालय सलेमपुर के टीचर्स कालोनी निवासी 54 वर्षीय चिकित्सक डा. तिवारी ने 13 वर्ष पूर्व 5 जून 1998 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ही डिस्पोजल निर्मित सामान के साथ पालीथिन का प्रयोग करने का संकल्प लिया। इस पर वे आज भी कायम हैं। तब विकास खंड क्षेत्र सलेमपुर के भरथुआं चौराहे पर आयोजित एक समारोह में जिला वन अधिकारी आरसी झा ने उन्हें प्रेरित किया और इस पर अमल करने का उन्होंने संकल्प लिया। हालांकि, इसके चलते उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। डाक्टर साहब कहते हैं कि जब कभी ऐसा मौका आता है, वे साफगोई से अपनी बात रखते हुए पालीथिन के इस्तेमाल से मना कर देते हैं। उनके इस प्रयास के लिए गणेश समाज कल्याण शिक्षा संस्थान सहित विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित भी किया है। डा. तिवारी कहते हैं कि इस 5 जून से वे इसके लिए युवाओं को प्रेरित करने का अभियान शुरू करने वाले हैं। डा. तिवारी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति छात्र जीवन से ही प्रेरणा मिलती रही। नेहरू युवा केन्द्र से सामाजिक गतिविधियों की शुरुआत करते हुए उन्होंने विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण स्वास्थ्य क्षेत्र में हमेशा योगदान किया। कहते हैं, प्लास्टिक पालीथिन के खतरों से हर कोई चिंतित हैं। बावजूद इसके, 'यूज ऐंड थ्रो' 'वन टाइम यूज' के कल्चर ने पालीथिन को हर आदमी के जीवन का हिस्सा बना दिया है। पर, अपने आसपास कचरों का पहाड़ बनने से रोकना है तो पालीथिन से तौबा करना ही होगा। उनके यहां विवाह अन्य उत्सवों में भी डिस्पोजल थाली गिलास का इस्तेमाल नहीं होता। वे कहते हैं कि इसमें उन्हें कोई दिक्कत भी नहीं आती।
जितेंद्र उप्पाधाय
 दैनिक जागरण देवरिया 
VMW Team