30 मई, 2012

खाली सीट को फिर से तलाशने लगी थीं उसकी बूढ़ी निगाहें।

स्टैण्ड पर बस के आते ही सवारियों के साथ मैं भी उसमें चढ़ने की कोशिश करने लगा। बड़ी जद्दोजहद के बाद आखिर बस में चढ़ पाने में कामयाब हो गया। मगर थोड़ी देर में भीष्ाण गर्मी के मारे भीड़ में दम घुटने लगा था। मेरे समीप ही एक ग्रामीण वृद्ध खड़ा था।  हाथ में गन्ने के 10-15 टुकड़ों का एक गटर लिए था।
उसका चेहरा उसकी दास्तां कह रहा था। वह रह रहकर बेचैनी-सी महसूस कर रहा था। सांसें भी कुछ लम्बी खींच रहा था। बस में खासी भीड़ थी क्योंकि बस काफी समय के बाद आई थी। खाली सीट पाने के लिए उसकी निगाहें थम गई। एक सीट को खाली देखते हुए उस पर उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा-बाबा इस सीट पर बैठ जाओ। 
इतने में दूसरी सवारी ने कहा यह हमारी सीट है, साथ वाले नीचे गए हैं। यह सुनकर वह वृद्ध बेबस, विवश, असहाय-सा होकर खड़ा रहा। अब बस रफ्तार तेज करते हुए उबड़ खाबड़ रास्ते पर दौड़ने लगी थी। मगर उस युवक की बगलवाली सीट अब भी खाली थी। यह देखकर वृद्ध ने पुन: बैठने की चेष्टा ही की थी कि उस युवक ने पीछे खड़ी एक नवयौवना को आकर बैठने का इशारा किया। यह देखकर धीरे से मुंह पिचकाकर ग्रामीण वृद्ध कुछ बुदबुदाने लगा और पुन: किसी खाली सीट को फिर से तलाशने लगी थीं उसकी बूढ़ी निगाहें।


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