03 अक्तूबर, 2017

दशहरा - by TRIPURENDRA OJHA

                
आज दशहरा है , मै अपने घर से हजार किलोमीटर दूर जॉब करता हूँ जिस वजह से हर दशहरा ,दीपावली और अन्य त्यौहार मै अपने घर वालों के साथ बिताऊं ऐसा संभव नही हो पाता लेकिन आने वाला हर त्यौहार अपने परिवार के साथ बताये गये पलों की याद से रंगीन जरूर हो जाता है ! जरा सी स्मृति की भंगिमाएं चेहरे पर हजार भाव एक साथ नृत्य कराने लगतीं हैं ! यकीनन बड़ा ही शानदार अनुभव होता है जब आपको चाहने वाला , आपके साथ खुशियों के पल बाँट रहा होता है और आप का उसके साथ बिताया गया एक एक क्षण अपने आप में बड़ा ही अनमोल और ह्रदय को सुकून देने वाला होता है जो शायद आज जिन्दगी के भागमभाग , और खुशियाँ खरीदने चक्कर में खो सा रहा है !
भला हो तमाम सोशल साइट्स का जिनकी वजह से आज हम एक दुसरे को देख सकते हैं,सुन सकते है, बात कर सकते है एक छद्म मुलाकात कर सकते है सबसे बड़ी बात एक साथ रह सकते हैं ,कितने महान थे वो लोग जो महीनों महीनो चिठ्ठियों का इन्तेजार किया करते थे और और फिर उन चिठ्ठियों का जवाब आने का सालों..इन्तेजार |
वैसे तो हमारा बचपन बहुत नवाबों जैसा नहीं गुजरा लेकिन उस उम्र में भी अपनी अमीरी कुछ कम नहीं थी ,हम मेला जाने के लिए इतने दीवाने हुआ करते थे कि पुराने मंदिर के पास गिनी चुनी लकठा ,गट्टा,बताशा , मूंगफली,बेर जलेबी कि टोकरियों को देखकर वो आनंद आता था जो आज macD,शौपिंग मॉल और पीवीआर में भी नहीं आता ! सामान खरीदने के चक्कर में जलेबियाँ चखना , बेर चखना , मूंगफली ऐसे ही खा लेते थे कि कुछ खरीदने कि जरूरत ही नहीं पड़ती और पेट भर जाता और साथ में ले गये तीनो रुपयों में से डेढ़ रूपये वापस भी ले आते , एक अठन्नी खो जाने का इतना टेंशन होता था कि एक एक घंटे उसको खोजते ही रहते !
उम्र बढ़ने के साथ साथ मेले के प्रति दीवानगी बनी रही, दशहरा में हमारे यहाँ दुर्गा जी कि मूर्तियाँ रखीं जाती है हर गली मुहल्लों नुक्कड़ों कस्बों और शहरों में मूर्तियों के साथ तेज आवाज में बजता लाउडस्पीकर ह्रदय में जो उमंग कि कम्पन पैदा करता था उसकी अनुभूति शब्दों में वर्णित नहीं कि जा सकती , मन अन्दर ही अन्दर हिलकोरें लेने लगता  और अगर कोई मूर्ती विशाल दिख जाती तो बाप रे .... अब तो हम यहाँ से एक घंटा से पहले हटने वाले नहीं ..एकटक बिना पलक झपकाए तब तक माँ दुर्गा को निहारते रहेंगे जब तक कि महिषासुर के एडी को काटने वाले सांप कि जीभ तक न दिख जाए !
वास्तव में बड़ा आनंदित करने वाला होता था मेला , तरह तरह के खिलौने ,तरह तरह के खाने वाले व्यंजन, तरह तरह की  मूर्तियाँ मानो लगता था माँ दुर्गा के साथ साथ पूरा स्वर्ग उतर आया हो !
हजारो ख्वाहिशों और उत्कंठाओं को दबाये हुए जब हम बड़े हुए तो वो हर चीज , हर शौक ,हर मजे करने कि सोची जिसके लिए बचपन में माँ कि अनुमति, मन कि अनुमति या फिर जेब कि अनुमति नही मिलीं थी ! बड़े भाई साहब डिफेन्स ट्रेनिंग कर के ६ महीने बाद घर आये हुए थे जिन्होंने समय से कुछ पहले ही घर कि सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने कन्धों पर उठा लिया था और उम्र से पहले ही बड़े हो गये थे सो कहने का तात्पर्य ये है कि अभी वो उम्र थी जिनमे बचपना और परिपक्वता के मसाले से जिन्दगी कि नींव और वो दीवार खड़ी हो रही होती है जिसपे जिन्दगी तमाम परीक्षाओ कि छत पड़नी होती है !
खैर हमने दशहरा मेला घूमने जाने को सोचा और वो भी यहाँ वहां नहीं , सीधे शहर कि तरफ जो लगभग 100 किलोमीटर पड़ता था जो ट्रेन की सुविधा होने कि वजह से 1.5 घंटे मालूम नही पड़ता था , उमंग में भरे दोनों भाई माता जी की आसान सी स्वीकृति पाकर( जो कि पहले बड़ा ही दुर्लभ हुआ करती थी ) निकल पड़े दशहरा मनाने |
ट्रेन का टाइम हो रहा था दोनों लोग जल्दी जल्दी तैयार हो रहे थे ,मेरा कपडा कहाँ है मेरी चड्डी मेरा तौलिया , अम्मा रूमाल है क्या ..अब बड़े हो गये थे न सो रुमाल रखने कि आदत डालनी अच्छी बात है जो आज तक नही पड़ी अलग बात है , जैसे तैसे तैयार होकर हम लोग बाहर निकले ,भैया ने अपनी पसंदीदा पेंट शर्ट पहना और मैंने अपना , भड़भडा के साइकिल निकाला और सवार होकर भागे | हमारी प्यारी साइकिल जो जिसने हम दोनों भाइयों कि  शिक्षा पूरी करने में खुद को खपा दिया , हमारे संघर्षों की मूक गवाह , रोज लगभग 30 किलोमीटर  बिना कोई तेल,पेट्रोल खाए अनवरत चलने वाली हमारी सदाबहार एटलस साइकिल जिसे बहुत जाम चलने कि वजह से एक बार बेइज्जत भी होना पड़ा था हमारे रिश्तेदार से ,हमें काफी दुःख हुआ था जब भैया हमारे फूफा जी को छोड़ने उसी साइकिल से लेकर स्टेशन छोड़ने गये थे |
साइकिल चलाने का भी अपना एक प्रोटोकाल होता है कोई बहुत बड़ा और वजनी जब अपने छोटी उम्र लड़के के के साइकिल पर बैठता है तो उसकी जगह करियर पर नही बल्कि सीट पर होती है और ऐसा न करने वाले को समाज निर्दयी ,और संस्कार हीन घोषित कर देता है जिससे अगला अपना वो भरोसा खो देता है कि  वो पुनः उस बच्चे के पुष्पक विमान के सवारी का सुख ले पाए तो इसी प्रोटोकाल के तहत फूफा जी साइकिल चला रहे थे और भैया पीछे बैठे थे आगे से मंद मंद बहती पछुवा हवा और जाम साइकिल उनकी नसे ढीली कर रही थी ,फेफड़े अपनी ताकत से ज्यादा काम कर रहे थे और धड़कन बीच बीच में रुक सी जाती थी जैसे तैसे वो चेहरा लाल किये अपने गंतव्य से थोडा पहले उतरे और और कुछ रुपये थमाते हुए बोले थे भाई इसकी सर्विसिंग करा लेना ,भैया ने कहा क्यों कुछ खराबी तो है नहीं इसमें!!! इस पर उन्होंने ऐसी बात कही जो आज भी ज्यों कि त्यों हमारे कानो में गूंजती है , उन्होंने कहा था “ जिस चीज के लिए साइकिल का अविष्कार हुआ वो चीज इसमें कहीं दूर दूर तक दिखाई नहीं देती”| किसी साइकिल के लिए इससे बड़ी बेइज्जती कि बात क्या हो सकती है जब उसने अपनी तमाम उम्र निस्वार्थ हमारी सेवा में लगा दी हो |
खैर जो भी हो हम दोनों भाई उसी साइकिल पर निकल पड़े ट्रेन पकड़ने ,आपको बता दूं कि साइकिल के करियर में एक पतली सी छड ढीली हो गई थी जो सदृश दिशा में क्षैतिज रूप से थोड़ी बाहर सरक जाती थी जो मौके बेमौके दोनों तरफ से पैर करके बैठने वालों के जांघ के पास पैंट फाड़ देती थी और दुर्भाग्यवश भैया पीछे बैठे थे साइकिल का बैलेंस बिगड़ा और रंग में भंग पड गया !!!
सबसे नई , सबसे शानदार , सबसे प्यारी वाली पैंट पहनी थी भैया ने जो उस रोमांचक होने वाली यात्रा के भेंट चढ़ गई और हमारा उत्साह ठंडा पड़ गया,सबसे बड़ी मुसीबत कि अब करें क्या ,फटा पैन्ट पहन कर जा नहीं सकते और इतना टाइम नहीं कि वापस जा कर फिर चेंज करके वो ट्रेन पकड़ लें , अब लगा कि हमारे अरमानों पर पानी फिर जायेगा तब तक एक उपाय आया |
दो ट्रेन आधे घंटे के अंतर पर आती थी शहर जाने को जिसमें एक पैसेंजर होती थी जो हर छोटे बड़े स्टेशन रुकते हुए जाती थी और एक्सप्रेस और टाइम दोनों. का हो चुका था हमारे घर के २० मिनट की दूरी पर एक छोटा सा स्टेशन है जिसपर केवल पैसेंजर ट्रेन्स मिलती है लेकिन हम बड़े वाले स्टेशन पर जाना पसंद करते है क्योंकि पैसेंजर ट्रेन का कोई ठिकाना नही होता और बड़े वाले स्टेशन से एक्सप्रेस भी ट्रेन मिल जाती है सो हमने सोचा कि गाँव के बाहर वाले स्टेशन से वो पैसेंजर पकड़ लें,  सो भाग के आये और चेंज करके स्टेशन कि तरफ पैदल भागे स्टेशन पर पहुँचते तब तक एक और त्रासदी हुई ,आँखों के सामने से वो ट्रेन निकल गई अब मुसीबत और बढ़ गई अब क्या करें घर वापस जाना मंजूर नहीं था और 5 किलोमीटर पैदल बड़े स्टेशन जाना आसान  नहीं था , समय हमें जाने नहीं देना चाहता था और हम ऐसे समय को जाने नहीं देना चाहते थे ,फिर हम लोग पैदल ही रेल कि पटरियों को पकड़ के अगले स्टेशन जाना शुरू कर दिए  ताकि वो एक्सप्रेस पकड़ सकें जो पिछले स्टेशन पर नहीं रूकती थी और जो कभी भी आ सकती थी क्योंकि समय हो चुका था|
जल्दी जल्दी चलते चलते मस्ती भी करते जा रहे थे रेलवे लाइन के किनारे के बेरियों को तोडना , पत्थर उठा के गेंदबाजी करना , डंडे तोड़ कर इधर उधर मारते चलना | अब स्टेशन का आउटर दिखना शुरू हो गया था कि अचानक हमारे कान उस खरगोश के कान की मानिंद खड़े हो गये जो खतरा भांपने का सेंसर होता है , पटरियों में से घिसने कि आवाज आ रही थी कान दिया तो लगा कि कोई ट्रेन आ रही है ,हालाँकि कोई ट्रेन दिखाई नहीं दे रही थी भैया ने तुरंत अपनी पदार्थ भौतिकी विज्ञानं लगा के दौड़ लगानी शुरू कर दी हम पूछे क्या हुआ ? बोले भाग ट्रेन आ रही है जल्दी चल नहीं तो छूट जायेगी ..भैया आगे आगे हम पीछे पीछे रह रह के मैं पीछे घूम के देख लेता था कि ऐसा तो नहीं जो मजे ले रहे हों तब तक हमें इंजन दिखा और हमारी धड़कन बढ़ गई ..मैंने अब अपना शत प्रतिशत लगाना शुरू कर दिया फॉर्मल चमड़े के जूते पत्थरों पर ठोकर खा खा कर बेहाल हो रहे थे भैया स्पोर्ट्स वाले जूते पहने अपने ट्रेनिग के जलवे दिखा रहे थे ..एक लम्बा फासला बढ़ता जा रहा था भैया और हमारे बीच जबकि ट्रेन का फासला नजदीक होता जा रहा था अब स्टेशन दिखने लगा था ट्रेन कि गति धीमी हो रही थी फिर भी हमारी तरफ तेजी से बढ़ रही थी |
हमारा गला सूख रहा था फिर भी जान लगा के दौड़े जा रहे थे कोशिश मेले में जाने कि नहीं बल्कि समय पर विजय पाने की हो रही थी किसी भी कीमत पर असफल होना हम दोनों भाइयों में से किसी को मंजूर नहीं था चाहे वो लक्ष्य गिल्ली डंडा के स्कोर का हो या क्रिकेट मैच का या फिर ट्रेन के साथ दौड़ लगा कर उसी ट्रेन को पकड़ने का , हारना मंजूर नहीं था |
ट्रेन के इंजन ने पहले हमें पीछे किया फिर भैया को, कम से कम एक किलो मीटर की दूरी बची थी और ट्रेन हमें पूरी पार
कर के स्टेशन जाकर खड़ी हो गई , हमने सारी शक्ति लगा के फिर दौड़ना शुरू किया भैया जैसे ही गार्ड के डिब्बे के पास पहुंचे कि सिग्नल ग्रीन हो गया , भैया इस उम्मीद में हाँफते हुए मुझे देख रहे थे कि तुम पहुँचो तो मैं चढ़ूँ वरना मैं भी छोड़ दूंगा |
ट्रेन खुल गई और मैं प्लेटफ़ॉर्म पर चढ़ गया भैया बोगी का हैंडल पकड के चलने लगे मैं भी करीब पहुँच गया ट्रेन ने गति पकडनी शुरू की और हम दोनों भाई चलती ट्रेन में घुस गये |
हमने कर दिखाया, जो चीज हमें चाहिए थी वो मिल गयी हम बेतहाशा हँसे जा रहे थे , वो ख़ुशी थी कोशिश को कामयाबी में बदलने की , वो ख़ुशी थी जीत की, वो ख़ुशी थी साथ मिल कर विजय हासिल करने की ......
हांफते हांफते ही हम 70किमी से ज्यादा दूर निकल आये पता नहीं चला ..हमें सामान्य होते होते शहर आ गया और हम उतर गये मेला करने ..
पहली बार मॉल का मजा ,एस्केलेटर और लिफ्ट में बेवजह ऊपर नीचे...बाहर बड़ी बड़ी मूर्तियाँ , यूनिवर्सिटी के पार्क का झूला , गोलगप्पे , और उस रात खूब घूमे जिंदगी  का उतना मजा शायद ही अब मिले कभी ..
रात में दो बजे वापसी कि ट्रेन थी , स्टेशन पर पहुँचते पहुँचते थकान अपने चरम पर थी ...ट्रेन के इन्तेजार में किसी के भारी भरकम डबल बेड साइज़ के लगेज पर आँख लग गई तब तक भैया ने हडबडा के उठाया ट्रेन आ गई थी ..हम बैठ गये और अब अपने स्टेशन उतरे जिस कसबे में पूरा बचपन बीता था दशहरा का मेला करते करते ...|
सब्जी मंडी पहुंचें तो घुप्प अँधेरा था और दुर्गा जी का पंडाल जगमगा रहा था और वहां लोगों का जनसमूह सुबह के ४ बजे प्रोजेक्टर पर अजय देवगन के मूवी का मजा ले रहा था ...हम भी वो फिल्म देखने बैठ गये और जब हल्का हल्का उजाला होना शुरू हुआ वहां से घर को निकल लिए .... इस घटना को  सात आठ वर्ष बीत चुके हैं पर जब भी दशहरा आता है और भैया से बात होती है तो बरबस ही हंसी छूट जाती है |


- TRIPURENDRA KUMAR OJHA
9044412246



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